DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दो टूक (17 अक्तूबर, 2009)

दिवाली के क्या कहने। अंधेरे के खिलाफ, रोशनी का उत्सव! आधुनिकता के सारे ताम-झाम के बावजूद सदियों से चली आ रही परम्परा का जोर होगा। शहरों में रंगीन झालर की लड़ियां जगमगाएंगी।

अंधेरे के आगोश में रहने वाली बस्तियों में दिए की बाती भी अंधेरे के सामने डटी होगी। फुलझड़ियों की चमक और पटाखों की गूंज होगी। खील-खिलौने की बहार भी। चाक पर सधे हाथों से आकार लिए मिट्टी के खिलौने और रंग-बिरंगी गणेश-लक्ष्मी होंगी। चहुंओर उजाले की यह लड़ाई हर रोज, सबके लिए हो तो क्या कहने। यह रोशनी और खुशी चंद इलाकों और लोगों तक सिमट कर न रह जाए। इसकी किरण हर हिन्दुस्तानी तक पहुंचनी चाहिए। हर शख्स का मुंह मीठा हो। महालक्ष्मी की कृपा हर घर पर हो। यही दुआ है। आमीन!

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दो टूक (17 अक्तूबर, 2009)