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दीप की परंपरा और ऋतु का अहसास

इतिहास सबका होता है। पर्व-त्योहारों का भी। दीपावली का भी है। यह इतिहास हम तक परंपरा से पहुंचता है। उसके लिए भूमि की खुदाई नहीं होती। धरती में दबे ठीकरे, उसके लिए किसी भी काम नहीं आते। पर न जाने क्यों पश्चिम के इतिहासकार मनुष्य का इतिहास मिट्टी की तहों के नीचे ही खोजते हैं। हमारे ग्रंथों और परंपराओं को वे लोग सदा से नकारते रहे हैं और उनके साथ खड़ा है, हमारे देश का पश्चिमीकृत मस्तिष्क।

हमारी परंपरा कहती है कि जिस दिन श्रीराम ने रावण का वध किया था, उस दिन को हम विजयादशमी के रूप में मनाते हैं। और तत्कालीन संसार के सबसे बड़े अत्याचारी साम्राज्य की सेना को ही नहीं, सबसे अत्याचारी और अधर्मी राक्षसी शक्ति को पराजित करने के बाद दशरथ पुत्र राम जब विजेता के रूप में अपने घर लौटे तो अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत करने के लिए, विजय और उत्सव की मानसिकता में, अपने नगर के प्रत्येक घर को दीपों से सजाया।

उस दिन पूरी की पूरी अयोध्या में दीपमालिका हुई। उसी उत्सव को हम हर साल पूरे देश में दीपावली के रूप में मनाते हैं। दीपमालिका जलाकर घर लौटे अपने विजेता का हम स्वागत करते हैं। यहां पर केवल विजय महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है, राक्षसत्व, अन्याय, अत्याचार और अधर्म पर विजय पाना। दीपावली का त्योहार वस्तुत: अपने घर आए देवत्व, न्याय, समता और धर्म का स्वागत करने का है।

हमारी संस्कृति अपने पर्व-त्योहारों का समारोह तो करती है, किंतु उसको भोग के रूप में नहीं मनाती, वह उसे धर्म से जोड़ देती है। व्रत-उपवास, पूजा-पाठ इत्यादि अपने-आप में चाहे धर्म हों, या न भी हों किंतु वे धर्म तक पहुंचने के मार्ग अवश्य हैं। दीपावली के पर्व और उत्सव के साथ भी पूजा जुड़ी हुई है। रात को प्रत्येक घर में लक्ष्मी की पूजा होती है। इस संदर्भ में मैं पूर्णत: अज्ञानी हूं कि उस रात को श्रीराम की पूजा न कर हम लक्ष्मी-पूजन क्यों करते हैं? बंगाल में दीपावली की रात को प्राय: मां काली की पूजा होती है। जरूर ही उसका भी कोई कारण होगा ही।

संध्या समय तक प्राय: लोग भूल जाते हैं कि हम राक्षसों को पूर्णत: ध्वस्त कर, धर्म की स्थापना कर सुरक्षित अपने घर लौटे महानायक श्रीराम का स्वागत करने के लिए दीपमालिका कर रहे हैं। उस समय केवल एक ही बात स्मरण रहती है कि हमें लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें रिझाना है, अपने घर पर आमंत्रित करना है, उनसे निवेदन करना है कि वे आएं और सदा के लिए हमारे ही घर में बस जाएं। 

लक्ष्मी पूजन के समय किसके मन में पूजा का कितना भाव होता है और धन का लोभ कितना, यह तो वही जानता है, किंतु इतना अवश्य है कि हमारी संस्कृति में त्याग, तपस्या और सारी आध्यात्मिकता के बाद भी यह स्वीकार किया गया है कि हमारे जीवन में लक्ष्मी का खासा महत्व है। विष्णुपुराण में लक्ष्मी की स्तुति करते हुए इंद्र ने यहां तक कहा है कि मां, जिसे तुम त्याग देती हो, वह बुद्घिमान भी मूर्ख ही माना जाता है और जिसे तुम संरक्षण देती हो, वह मूर्ख भी बुद्घिमान और विद्वान् बन जाता है।

इस जीवन और संसार में धन केवल आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। धन अपने आप में एक शक्ति है। परंपरागत व्यापार जगत् में दीपावली से ही वित्त वर्ष आरंभ होता है। इसी दिन पिछले वर्ष के बही खातों को बंद कर नए बही खाते आरंभ किए जाते हैं। कई लोगों का नर्व वर्ष तो यहीं से शुरू होता है।
मेरे मन में एक विचार आता है कि सीता जी लक्ष्मी का अवतार हैं। अत: लक्ष्मी-पूजन के रूप में शायद हम सीता जी का ही स्वागत करते हैं, किंतु पूजा केवल लक्ष्मी की होती है, लक्ष्मीपति की नहीं।

हमारे पर्व-त्योहारों के साथ एक और महत्वपूर्ण तत्व भी जुड़ा हुआ है। वह है, ऋतु परिवर्तन की सूचना। दीपावली हमारे लिए ग्रीष्म-वर्षा आदि की समाप्ति और शीत के आगमन का संदेश है। खुले आकाश के नीचे दीप जलता रहे, तो पवन-वेग और वर्षा का भय नहीं रह जाता है। मुक्ताकाशी उत्सवों का आरंभ वैसे तो नवरात्र से ही हो जाता है, किंतु सारी रात खुले आकाश के नीचे जलते दीपक हमें और हमारी दुनिया को ऋतु संबंधी अनेक संदेश देते हैं। यह हमारे देश की सबसे सुखद ऋतु है, जब न तो ग्रीष्म का ताप सताता है, न शीतल पवन के झोंके हमें ठिठुरने को बाध्य करते हैं। हां, यह संकेत अवश्य करते हैं कि अब ऊनी वस्त्र निकाल लिए जाएं, आगे उनकी आवश्यकता पड़ेगी।

पाश्चात्य पंचांग के अनुसार दीपावली कभी अक्तूबर में आती है, कभी नवंबर में भी आ जाती है। किंतु भारतीय पंचांग में वह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को होती है। यही कारण है कि भारत की ऋतुओं और उन पर आधारित भारत के पर्व-त्योहारों की जानकारी, भारतीय पंचांग के आधार पर ही अधिक विश्वसनीय है। हम जानते हैं कि दीपावली शीत ऋतु के आने का संदेश ले कर आई है और होली ग्रीष्म के कपाट थपथपाती है। अत: दीपावली हमें अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने धर्म अपनी राष्ट्रीयता, और अपने वातावरण को एक साथ स्मरण कराती है। हमारे ज्यादातर त्योहार इसी प्रकार कई परंपराओं के संश्लिष्ट रूप हैं।

लेखक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं

narendra.kohli @yahoo. com

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