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बेशर्म की तरह खुद को गांधीवादी कहता हूं

मैं जिस तरह बापू गांधी का जन्म दिन मनाता हूं, वह उसे कभी पसंद नहीं करते। फिर भी मैं बेशर्म की तरह खुद को गांधीवादी कहता हूं। उस खास दिन मैं अपनी माल्ट व्हिस्की का गिलास उठाता हूं। वह जहां भी हैं उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करता हूं। यह भी दुआ करता हूं कि हे बापू, हम आपके नक्शे कदम पर चल सकें। हम जो कहें, वह करके भी दिखाएं।

हम जानते हैं कि हमने आपको शर्मसार किया है। हमने कई बार आपकी उम्मीदों को तोड़ा है। आपकी जयंती और पुण्यतिथि पर हम बस बड़ी-बड़ी बातें बनाते रहे हैं। काम हमने कहां किया है? हम उस दिन आपके पसंदीदा भजन गाते रहे हैं। मसलन, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीड़ पराई जाणे रे।’ या ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान।’ लेकिन उसके उलट एक-दूसरे का गला काटने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई है। मंदिर मसजिद के नाम पर हम एक-दूसरे की जान के प्यासे रहे हैं।
 
हमने आपके नाम पर एक शहर बनाया। उसे नाम दिया गांधीनगर। उसी शहर से लोकसभा में पहुंचे एक शख्स ने देश भर में रथ यात्रा निकाली। उसीकी वजह से मुसलमानों की इबादत करने की एक जगह को तोड़ दिया गया। हम गुजरात को बड़ी इज्जत और अपनेपन के साथ देखते हैं। आखिर आपने वहां जन्म लिया था। लेकिन आज वहीं के मुख्यमंत्री ने हजारों गुजराती मुसलमानों की हत्या कराई। उसका कोई अफसोस तक नहीं है उन्हें।

वह भूल गए कि आपके पहले मुवक्किल गुजराती मुसलमान ही थे। वे ही आपको अपना मुकदमा लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका ले कर गए थे। यही नहीं, अपने यहां ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जो मानते हैं कि आपके अहिंसा के फलसफे की वजह से ही यह देश कमजोर बना रहा है। हमारी शख्सियत में मारक अंदाज की कमी को वे अहिंसा में देखते हैं। यह अलग बात है कि हम आपको राष्ट्रपिता कहते हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि राष्ट्र को बनाने में आपकी भूमिका क्या है?

शायद इसीलिए हम आपकी जयंती पर छुट्टी मना लेते हैं। काम से ही छुट्टी ले लेते हैं। और अपने परिवारों के साथ पिकनिक मनाने निकल पड़ते हैं। चिड़ियाघर चले जाते हैं। या सिनेमा देखने पहुंच जाते हैं। आप कहते थे कि काम ही पूजा है। हम उसे मान ही नहीं पाते। मैं बार-बार अपने को भरोसा दिलाता हूं कि आप ही हमारे वक्त के मसीहा थे। आपने हमें सही रास्ता दिखाया था। हम आपसे ज्यादा शायद ही किसी मसीहा के बारे में जानते हों। उसकी वजह यह है कि ज्यादातर मसीहों की जिंदगी करिश्मे के कोहरे में लिपटी हुई है। और यह करिश्मे का कोहरा उनके चेले चंटारों की बदौलत है।

आपकी जिंदगी तो खुली किताब की तरह रही है। आपने अपने बारे में कुछ भी तो नहीं छिपाया। आप सत्य में भरोसा करते रहे। चाहे वह कितना ही परेशान करने वाला रहा हो। हालांकि मैं आपकी ढेरों बातों को नहीं मानता। लेकिन इतनी कोशिश जरूर करता हूं कि सच्च रह सकूं। मैं कोशिश करता हूं। कई बार कामयाब नहीं भी हो पाता। लेकिन अपनी कोशिश कभी नहीं छोड़ता। मैंने आपसे यही सीखा है कि कोशिशें नहीं छोड़नी चाहिए। आखिर में एक दुआ करना चाहता हूं, बापू आपकी आत्मा हमें तब तक रास्ता दिखाती रहे, जब तक हमें अपनी मंजिल न मिल जाए।

कविता की शरण
हर्ष मुंबई हाईकोर्ट के मशहूर वकील अशोक देसाई के बेटे हैं। उन्होंने भी अपने पिता की तरह वकालत की पढ़ाई की। फिर वकालत की शुरुआत भी की। लेकिन उनका मन उसमें रमा नहीं। आखिरकार उन्होंने वकालत छोड़ दी। हर्ष ने शादी भी की। लेकिन वह भी ज्यादा दिन नहीं चली। उसे भी उन्होंने छोड़ दिया।
 
अब वह पूरी तरह अपने पसंदीदा काम में लगे हैं। उन्हें लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है। उनकी कविता की पहली किताब हाल ही में आई है। फुलसर्कल से आई उनकी किताब है ‘यू से इट इज नॉट ट्रू।’ यह दुबली पतली सी किताब है। उन्होंने एक एडवांस कॉपी मुझे भेज दी थी। उनकी कविताएं पढ़ कर अच्छा लगा। एक कविता के कुछ हिस्से आप तक भी पहुंचाना चाहता हूं-

कुछ कमाने का बोझ महसूस करता हूं।
किसी भी तरह बस कमाऊं मैं।
लेकिन मैं पढ़ना और गाना चाहता हूं।
हंसना और शायद प्यार करना भी।

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