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अंधेरी रात में दीपक..

दीपावली है आज। हमारे पुरखों ने ठीक अमावस्या के दिन इसे मनाने का फैसला किया। अमावस्या को रात बहुत अंधेरी होती है। उस अंधेरी रात में दीया जलाने की कोशिश। यह सोच ही कितनी अद्भुत लगती है। अरे, अंधेरी रात में ही तो दीया जलाने की जरूरत पड़ती है। हमारी जिंदगी में जितनी अंधेरी रात होती है, उतनी ही हमें रोशनी की जरूरत होती है। उतना ही दीया जलाने की चाहत!
 
प्रकृति पर विजय के तौर पर भी इसे देखा जा सकता है। अगर हम पश्चिम के चश्मे से देखते हैं, तो इसमें हमें प्रकृति पर विजय के बीज दिखलाई पड़ जाते हैं। लेकिन अपना समाज तो प्रकृति को अपने विरोधी के तौर पर नहीं देखता। हम तो उसे सहचरी  के तौर पर मानते हैं। इसलिए प्रकृति पर विजय की सोच भी नहीं सकते।
 
लेकिन अपनी प्रकृति पर हम विजय जरूर पाना चाहते हैं। हमारी अपनी प्रकृति न जाने किन अंधेरी राहों में भटक गई है। असल में हमारी प्रकृति पर अपने ही अंधेरे हावी हो जाते हैं। इतने हावी कि हम उसे खुद ही पहचान नहीं पाते। उन्हीं अंधेरों से अपनी प्रकृति को निकालना होता है। अपनी प्रकृति को भी ढूंढने के लिए दीये की जरूरत होती है। वह दीया अपने भीतर जलाना होता है। अपनी प्रकृति को प्रकाशित करना होता है। उस दब-छिप गई प्रकृति पर जब प्रकाश पड़ता है, तो वह जगमगा उठती है। हमारा समूचा व्यक्तित्व ही जगमगा उठता है। वह जब जगमगाता है तो  हम चकित से अपने को ही देखते रह जाते हैं। अपने ही दबे छिपे न जाने कितने आयाम हमें दिखने लगते हैं।
 
लेकिन इस दिन को राम से क्यों जोड़ा गया? शायद इसलिए कि अपने भीतर की यात्रा करने में तपस्या की जरूरत होती है। और तपस्या बिना मर्यादा के नहीं हो सकती। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं राम। हम उत्तम पुरुष तभी हो सकते हैं, जब मर्यादा में हों। राम के वापस घर आने पर दीप जलाए गए थे। यह वापसी क्या अपने में लौटना नहीं है? हम जब अपनी प्रकृति में लौट कर आते हैं, तो सचमुच वह दीवाली होती है। अंधेरा सोने की अवस्था है और दीया जागने की। दीया बताता है कि हम सोए नहीं हैं। हम जाग रहे हैं।

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