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कलमाडी का गुस्सा

हफ्ते भर पहले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी का जायजा लेने दिल्ली आए विदेशी प्रतिनिधियों के दौरे के बाद जो आशावादी वातावरण बनाया गया था, वह इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन और आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाडी के गुस्से से तनाव में बदल गया लगता है। कलमाडी ने जिस तरह से कामनवेल्थ गेम्स फेडरेशन(सीजीएफ)के भारत में नियुक्त सीईओ माइक हूपर को हटाने की मांग कर डाली और दूसरी तरफ से सीजीएफ के अध्यक्ष माइक फेनेल ने उसे खारिज कर दिया, उससे साफ लग रहा है कि यह आयोजन देशी और विदेशी रस्साकसी में उलझता जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय निगरानी समिति जिस कुशलता और तेजी से आयोजन की तैयारी करवाना चाहती है, वह भारतीय आयोजकों को नागवार गुजर रहा है। लोकतांत्रिक देश होने और हर जगह राजनीति करने की प्रवृत्ति के चलते भारत की काम करने की अपनी स्टाइल है। इसीलिए जब भी कहीं से उसे चुस्त रहने की सलाह दी जाती है तो उसे अपने स्वाभिमान और संप्रभुता पर आंच आती दिखती है। कामनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के प्रमुख फेनेल तैयारी की ढिलाई को लेकर पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को पत्र लिख चुके हैं।

इस बार अन्य प्रतिनिधियों के साथ जायजा लेने के बाद उन्होंने निगरानी के लिए एक तकनीकी समिति बनाने का सुझाव दिया है। लेकिन कलमाडी और भारतीय आयोजन समिति के अन्य सदस्य इस आलोचना और सुझाव से सीख लेकर अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने की बजाय पलटवार करने में लग गए। जिस जगह से फेनेल काम तेज करने के बारे में अपने सुझाव दे गए थे, वहीं से कलमाडी ने हूपर के खर्चे पर सवाल करते हुए उन्हें अवरोधक बताया और तत्काल हटाने की मांग कर डाली। 

उससे भी आगे बढ़ कर एक अन्य सदस्य ने भारत की संप्रभुता का सवाल उठा दिया। एक तरफ कलमाडी हूपर पर दो साल में किए गए खर्च पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं आयोजन समिति के सदस्य जांच के लिए कैग से अनुरोध कर रहे हैं। संभव है यह झगड़ा भारतीय और विदेशी कार्यप्रणाली का मतभेद मात्र हो। जहां फेनेल और हूपर कड़ी निगरानी में काम करने के अभ्यस्त हों, वहीं भारतीय लोग समन्वय के वातावरण में काम करने में सहज महसूस करते हों। पर आज की जरूरत संप्रभुता और स्वाभिमान के नाम पर बेवजह टकराव नहीं है। खेल का सर्वश्रेष्ठ आयोजन करने के लिए राजनीति नहीं खेल की भावना पैदा करनी होगी।

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