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धर्म के नाम पर शोषण

आज के दौर में पैसा कमाने की होड़ है। आज व्यक्ति भौतिकवाद में इतना खो गया है कि धीरे-धीरे अपने आदर्शो और कर्तव्यों को भूलता जा रहा है। अमीर हो या गरीब, पैसे के लिए अपने आदर्श खोता जा रहा है। आज धार्मिक स्थलों पर बने मंदिरों में बिना भक्त की इच्छा के उनसे संकल्प कराया जाता है या मंदिर में खुद पैसा चढ़ाने के लिए बोला जाता है। ऐसे में पंडितों द्वारा दक्षिणा चढ़ाने के लिए बोलना भक्तों की भक्ति को ठेस पहुंचाने जैसा है। वैसे भी वह मंदिर है उसे बिजनेस या भौतिकवाद में शामिल न किया जाए तो अच्छा है। आज धन कमाना हर व्यक्ति की जरूरत हो गयी है और यह गलत भी नहीं है, पर जरूरत है धन किस तरीके से कमाया जाए।  हमारे देश में धार्मिक स्थलों पर देश-विदेश से अनेक श्रद्धालु आते हैं ऐसे में हम लोगों का कर्तव्य है कि उनका मार्गदर्शन करें, न कि शोषण।
कुसुम रावत, हरिद्वार

प्रतिबंधित हों परमाणु हथियार
आज प्रत्येक राष्ट्र में परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बनने की होड़ मची हुई है।  आज पूरी दुनिया के पास कई हजार परमाणु बम हैं, जबकि पूरी पृथ्वी को खत्म करने के लिए मात्र कुछ ही परमाणु बम काफी हैं। पाकिस्तान जैसे राष्ट्र परमाणु ताकत में भारत से आगे निकल गये हैं जो भारत और अन्य देशों के लिये खतरे से खाली नहीं हैं। परमाणु बम का असर क्या होता है ये जापान के लोग अच्छी तरह जानते हैं। अगर हम वास्तव  में यह चाहते हैं कि ये खूबसूरत दुनिया बची रहे तो दुनिया में यूनेस्को, नाटो तथा यूएनओ जैसे संगठनों को परमाणु बमों और हथियार प्रतिबंधित कर नष्ट कर देने चाहिए।
दिनेश दत्त उनियाल, बडोन गांव, टिहरी

पॉलीथीन के निर्माण पर रोक
पॉलीथीन के प्रयोग से सड़कों पर, नालियों में, नदियों में यहां तक की मंदिरों के आसपास भी पॉलीथीन के कूड़े के ढेर ही दिखाई देते हैं। सरकार को इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए और पॉलीथीन की फैक्ट्री के स्थान पर सोलर कुकर, सोलर सेल आदि की फैक्ट्री लगायी जानी चाहिए जिससे ये उत्पाद आम आदमी की पहुंच से आ सके और हमारी निर्भरता एलपीजी गैस और पेट्रोल पर थोड़ी कम हो सके। हमें कागज के बने लिफाफों और जूट के बने थैलों का प्रयोग करना चाहिए। यदि हम अपने शहर और अपने देश को सुंदर देखना चाहते हैं तो हमें पॉलीथीन के निर्माण और प्रयोग पर रोक लगवानी ही होगी।
पद्मावती तनेजा, ज्वालापुर, हरिद्वार

संस्कृत का प्रचार प्रसार जरूरी
संस्कृत भाषा, जिसे  देववाणी भी कहा जाता है, आज धीरे-धीरे सिमटती नजर आ रही है। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसे देवताओं के द्वारा लिखा व बोला जाता था। आज आधुनिकता की दौड़ में हम संस्कृत को भूलने लगे हैं। आज भारत में कुछ सीमित ही विवि हैं जहां संस्कृत को मुख्य रूप से पढ़ाया व सिखाया जाता है। संस्कृत का प्रचार-प्रसार करने व इसे आम बोल-चाल की भाषा बनाने के लिए संस्कृत के विद्वानों व जानकारों को एक जनजागृति अभियान चलाने की आवश्यकता है, साथ ही सरकार को दायित्व है कि इण्टरमीडिएट की शिक्षा तक संस्कृत को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जाये तभी संस्कृत का प्रचार होगा व लोग इसे समझोंगे।
चन्द्रशेखर पैन्यूली, मास कॉम, श्रीनगर

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