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किस निवेश में मिला कितना रिटर्न

दीवाली तो बस निवेशकों की
दीवाली तो इस बार निवेशक मनाएंगे। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं। पिछली दीवाली से इस दीवाली तक में ही उन्हें जो 50 फीसदी तक का रिटर्न जो मिल चुका है। यह रिटर्न इस लिए खुशियों को दोगुना कर रहा है कि क्योंकि पिछली दीवाली मंदी के दानव ने काली कर दी थी।

शेयर बाजार आमतौर रिस्की निवेश का स्थान समझा जाता है। और इस बात को पिछले साल की गिरावट ने सिद्ध भी किया। लेकिन सच कुछ और ही है। वह है कि अगर कहीं रिटर्न मिलता है तो यहीं पर। आंकड़ों के हिसाब से अगर किसी ने सूचकांक के 21 हजार के स्तर पर निवेश किया होगा तो उसको अभी भी घाटा हो रहा है, लेकिन अगर उसकी एक दीवाली पहले उसने निवेश किया होगा तो वह आज भी करीब 35 फीसदी के फायदे में है।

यानी तीसरी दीवाली पर उसका एक लाख रुपए बढ़कर एक लाख पैंतीस हजार रुपए हो गया होगा। इस रिटर्न में शेयर बाजार में आई भयानक मंदी का नुकसान भी शामिल है, लेकिन अगर निवेश को पांच दीवाली पीछे किया गया होता तो निवेशकों का पैसा तमाम उतार-चढ़ाव और मंदी के बाद भी दोगुना हो चुका होता। ऊपर से लम्बे समय के निवेश के चलते कोई आयकर भी नहीं देना पड़ता।

हालांकि यह आंकड़ों की बात है लेकिन सच्चई यह है कि शेयर बाजार में ज्यादातर दिग्गजों ने जनवरी से अब तक ही 100 फीसदी से ज्यादा का रिटर्न दे दिया है। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज से लेकर एलएंडटी जैसे शेयर शामिल हैं।

मिडकैप में ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने कई गुना तक का रिटर्न दिया है। इसीलिए जानकार कहते हैं कि अपनी आय का कुछ हिस्सा शेयर बाजार में जरूर लगाना चाहिए। बस ध्यान रखने की बात है कि शेयर का चयन सही हो और निवेश लम्बे समय के लिए किया जाए।

छोटे मियां भी कम नहीं
शेयर बाजार का छोटा भाई म्यूचुअल फंड भी रिटर्न के मामले में कम नहीं रहा। इसने जहां पिछली दीवाली से इस दीवाली के बीच निवेशकों का पैसा दोगुना किया वहीं पांच साल में तो 40 फीसदी से ज्यादा का कम्पाउंड रिटर्न दिया है यानी रिटर्न में छोटे मियां का जवाब नहीं रहा। यही कारण है कि मंदी के दौरान कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाए तो इस बाजार की ऐसेट लगातार बढ़ रही है। 

देश में सबसे तेजी से बढ़ती इंडस्ट्री के रूप में म्यूचुअल फंड उभर कर सामने आ रहा है। इस वक्त सात लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम का म्यूचुअल फंड कंपनियां प्रबंधन कर रही हैं। मंदी के समय में यह रकम पांच लाख करोड़ रुपए से भी कम की रह गई थी। इस आधार पर देखा जाए तो काफी सारा निवेश मंदी के बाद ही आया है यानी पिछली दीवाली से इस दीवाली के बीच। और यह साल निवेशकों के लिए काफी अच्छा रहा है। जानकारों की राय में म्यूचुअल फंड में निवेश अभी भी फायदा दे सकता है। बल्कि अब तो फायदे की उम्मीद और बढ़ गई है। क्योंकि म्यूचुअल फंड में इंट्री लोड हटा दिया गया है। यानी जितना निवेश किया जाएगा उतने पैसे की यूनिट एलाट होगी। मतलब साफ है कि अगली दीवाली में रिटर्न और अच्छा होने की आस।
 
सरकारी लाइफलाइन के बूते कमाया भरोसा

पिछले साल इन्हीं दिनों अमेरिकी सबप्राइम का भूत दुनियाभर को डरा रहा था। भारत में इसका असर देखा गया, लेकिन बाकी दुनिया की तुलना में यहां खौफ काफी कम था। निवेशकों ने जहां बाजार से हाथ खींच लिए वहीं घर का सपना संजोए बैठे वास्तविक खरीदारों ने अपने हाथ खींच लिए। बिल्डर और डेवलपर आर्थिक संकट में घिर आए। बैंकों और प्रोजेक्ट फंडिंग कंपनियों ने हाथ खींच लिए। पैसे की तंगी से प्रोजेक्ट लटकने लगे। भय और संशय का वातावरण हर तरफ दिखने लगा। मीडिया में खबरें आने लगीं कि फलां शहर में प्रॉपर्टी में इतना मंदा आ गया तो फलां शहर में इतने लोगों का पैसा प्रॉपर्टी के धंधे में फंस गया। बिल्डर और ग्राहक दोनों तरफ का विश्वास नित नई गिरावट दर्ज करने लगा।

गिरावट थमी
ऐसे में सरकार ने पहल करते हुए एक के बाद एक आरबीआई की मार्फत तीन प्रोत्साहन पैकेज बाजार के सामने पेश किए। इन तीनों पैकेजों ने लाइफलाइन की तरह काम किया और गिरावट का माहौल थोड़ा थमने लगा। मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों में 20 से 25 फीसदी की गिरावट देखी गई, लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के बाद बैंकों ने रियल्टी सेक्टर के जख्मों पर मरहम लगाने का काम शुरू किया। ब्याज दरों में आधे से लेकर एक-एक प्रतिशत की कमी के साथ बाजार की हिलती दीवारों में स्थिरता का सीमेंट जमने लगा।

लौटने लगे वास्तविक खरीदार
निवेशकों का भरोसा भले ही अभी तक पूरी तरह से बाजार पर न जमा हो, लेकिन ब्याज दरों में कमी से वास्तविक खरीदारों ने एक बार फिर बाजार का रुख करना शुरू कर दिया है। फिक्की की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक इस काम को अंजाम दिया है बिल्डरों की बदलती सोच ने। जब तेजी का माहौल था तो हर बिल्डर मोटे ग्राहकों को रिझाने के लिए बड़े प्रोजेक्ट बना रहा था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। रियल एस्टेट मार्केट को नया मंत्र मिल गया है अफोर्डेबल होम्स का यानी आम आदमी के लिए छोटा लेकिन उसकी जरूरतों को पूरा करने वाला घर। कई जानी-मानी कंपनियों ने अफोर्डेबल होम्स के कांसेप्ट का अपनाते हुए बाजार में अच्छा रिस्पांस हासिल किया है। कुल मिलाकर यह कि मंदी के हिचकोले खाने के बाद एक बार फिर पटरी पर लौट रहा है बिल्डरों और ग्राहकों का विश्वास और उम्मीद है कि निवेशक भी जल्द ही इस तरफ का रुख करेंगे।


चांदी : दबे पांव बढ़ी चमक
एक समय था जब कहा जाता था कि सोने की खनक के सामने चांदी की चमक कहीं नहीं बैठती, लेकिन पिछले एक साल ने इन सब बातों को झुठला दिया है। आर्थिक मंदी के चक्कर में सेफ हैवन पाने की फिराक में निवेशकों ने सोने के साथ-साथ चांदी को भी हाथों हाथ लिया। कमोडिटी मार्केट में चांदी को निवेशकों ने भारी समर्थन दिया। वैसे भी औद्योगिक क्षेत्रों के मंदी से उबरने का असर सीधे चांदी की मांग पर पड़ा और चांदी दबे पांव आगे बढ़ती रही। पिछले साल दिवाली के मौके पर हाजिर चांदी की कीमत 17,400 रुपये प्रति किलो थी जो आज बढ़कर 27,200 रुपये हो चुकी है। यानी 60 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी जिसमें से पिछले छह महीने में 30 फीसदी की तेजी दर्ज की गई।

सोने को छोड़ा पीछे
सोने की तरह चांदी ने भी तेजी के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। विश्व बाजारों में ईटीएफ की चलन बढ़ने से इसके चाहने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ जिसका असर इसके दामों में भी देखने को मिला। चांदी पिछली दिवाली पर जहां 9.63 डॉलर प्रति औंस थी वह आज बढ़कर 17.90 डॉलर प्रति औंस हो चुकी है यानी लगभग दोगुनी। इस तेजी के पीछे कहा जा रही है कि इस कमोडिटी को औद्योगिक इस्तेमाल ज्यादा होता है और अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लौटने का संकेत यह है कि चांदी की खपत बढ़ रही है और उद्योग-धंधे फिर से पटरी पर आने लगे हैं। साथ ही निवेशकों को महंगे सोने का विकल्प चांदी मे नजर आने लगा है। इस बात का सबूत है कि चांदी की चमक ने सोने की खनक को पीछे छोड़ दिया है, कम से कम निवेशकों की नजर में तो। 

मंदी और संकट का नाम सुनकर लगभग हर तरह के निवेशक के कान के पीछे पसीने की लकीर उभर आती है, लेकिन दुनिया में सिर्फ सोना ही एक ऐसी चीज है जो संकट में आने पर ज्यादा चमकने लगता है। पिछले साल की अमेरिकी सब प्राइम जनित आर्थिक मंदी ने शेयर बाजार और रियल एस्टेट बाजार की चूलें हिला कर रख दीं। ऐसे में सोना भला कहां चूकता, संकट की महक पाकर लगा कुलाचें भरने। पिछली दिवाली पर जहां शुद्ध सोना 12,000 प्रति दस ग्राम था वह इस दिवाली पर 16,080 रुपये प्रति दस ग्राम हो गया है। यानी सीधे-सीधे लगभग 30 फीसदी की उछाल जिसमें से 12.5 प्रतिशत की तेजी तो पिछले छह माह में अर्थव्यवस्था में आई चमक की वजह से हासिल हुई है।

मिला निवेशकों का भरोसा
सदियों से कहा जाता रहा है कि सोना बुरे वक्त में काम आता है, लेकिन इस बार की मंदी ने दिखा दिया है कि सोना सिर्फ संकट में ही नहीं काम आता बल्कि निवेश का भी एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। ई-गोल्ड यानी गोल्ड ईटीएफ ने निवेशकों को नई राह दिखा दी है। यही नहीं शुद्धता की कमी का खतरा भी अब बैंकों के सिक्कों ने दूर कर दिया है। निवेशक बेफिक्र होकर निवेश करने लगे हैं। यह हाल पूरी दुनिया में देखा जा रहा है। पिछले साल दिवाली के मौके पर जहां सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार 760 डॉलर प्रति औंस था वह आज नई ऊंचाइयां बनाता हुआ 1062 डॉलर प्रति औंस पर आ खड़ा हुआ है। पिछले एक साल में यह बात खासतौर पर देखी गई कि अर्थव्यस्था में मंदी के बाद लौटी तेजी का नकारात्मक असर सोने पर नहीं पड़ा, और तो और आईएमएफ जैसे बड़े खिलाड़ियों द्वारा सोना बेचे जाने की खबर भी सोने की चमक फीकी नहीं कर पाई।

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