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मंथन के मुद्दे

1. कृषि में भारी निवेश से ही बदलेगी बिहार की दशा व दिशा :
प्रचूर मात्रा में जल संसाधन से युक्त इस राज्य में उपजाऊ जमीन की कोई कमी नहीं है क्योंकि नदियां अपने साथ उपजाऊ मिट्टी को भी बहाकर लाती हैं जो वह राज्य के मैदानों फैला देती हैं। लेकिन चकबंदी का पूरी तरह लागू न होना, सिंचाई व्यवस्था की कमी, हर साल आने वाली बाढ़ आदि के कारण कृषि को नुकसान पहुंचता है।
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2. गुणवत्ता व संख्या में सरकारी स्कूलों की हालत सुधारना जरूरी :
इससे गरीब तबके के छात्रों की भी अच्छी शिक्षा तक पहुंच होगी, जिससे स्कूली शिक्षा में सुधार होगा और आगे चलकर आईआईटी-आईआईएम जैसे संस्थानों में मिलने वाले आरक्षण का वह पूरी तरह से फायदा उठा सकें। मौजूदा दौर में आरक्षण का फायदा सिर्फ क्रीमी लेयर को मिल रहा है।
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3. चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवाओं का विकास असंतोषजनक :
राज्य में चिकित्सा सेवाओं की कमी के कारण अधिसंख्य लोगों की पहुंच अस्पतालों तक नहीं है। जो कुछ गैर सरकारी अस्पताल राज्य में हैं उन तक गरीबों की पहुंच नहीं है और सरकार की अनदेखी के कारण सरकारी अस्पतालों की कमी साफ देखी जा सकती है। राज्य में कानून व्यवस्था के ठीक न होने के कारण अच्छे डॉक्टर यहां लौटना नहीं चाहते।
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4. समतामूलक समग्र विकास की अवधारणा :
देश के अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी एक छोटा वर्ग जो साधन संपन्न है वह और भी ज्यादा अमीर होता चला जा रहा है। जबकि दूसरा साधनों से दूर गरीब वर्ग और भी ज्यादा गरीब होता जा रहा है। गरीबों की साधनों तक पहुंच अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाई है। एक समतामूलक समाज और उसके समग्र विकास के लिए गरीब तबके की भी संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है।
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5. चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार :
कहा जाता है कि गरीबी अपने साथ बीमारी को भी लेकर आती है। बिहार के बारे में यह बात कई माइनों में उचित है। यहां का गरीब अत्यंत गरीब है और साधन वर्ग व्यक्ति उसकी तरफ देखना भी नहीं चाहता। राज्य में एम्स की तर्ज पर न तो काई बड़ा अस्पताल ही है और न ही प्राथमिक अस्पताल उस संख्या में हैं जितनी इनकी जरूरत है। चिकित्सा क्षेत्र में सुधार के लिए प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना होगा।
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6. महिला सशक्तिकरण :
आधी जनसंख्या आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक चेतना के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। देश की संसद में ही अभी तक महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल लटका हुआ है। हालांकि पंचायती राज में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना एक सुखद बात है। लेकिन यह चिंता की बात है कि महिला आरक्षण का सबसे ज्यादा विरोध बिहार से ही सामने आया है। सिर्फ आरक्षण ही नहीं उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा की ओर ध्यान देने के अलावा अवसर प्रदान करना भी एक चुनौती है।
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7. जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण : 
यह समस्या सिर्फ बिहार की ही नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या है। सीमित संसाधनों के बीच जनसंख्या का लगातार तेजी से बढ़ना कई विकृतियों को जन्म देता है। जनसंख्या विस्फोट के कारण अवसर की कमी, खराब चिकित्सा व्यवस्था, अपराध आदि समस्याएं सामने आती हैं। हालांकि इस दौर में देश के कई राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने में कामयाबी भी हासिल की है। बिहार में ऐसी कोई भी नीति अभी तक सफल नहीं हो पाई है। सरकार का फर्ज है कि वह न सिर्फ परिवार नियोजन के बारे में लोगों को सही जानकारी दे बल्कि जनसंख्या विस्फोट से होने वाले नुकसान के प्रति भी आगाह करे।
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8. औद्योगीकरण और निवेश अभी भी दूर की कौड़ी :
आजादी से कुछ पहले और बाद के सालों में बिहार में कई उद्योग लगे जो धीरे-धीरे या तो बंद हो गए या उन्होंने अपना काम सीमित कर लिया। राज्य सरकार केन्द्र पर राज्य के साथ भेदभाव का आरोप लगाती रही है, लेकिन राज्य सरकार ने स्वयं न तो राज्य के औद्योगीकरण की तरफ ध्यान दिया और न ही निवेश के लिए सही प्लेटफॉर्म ही तैयार किया। कानून व्यवस्था की अराजकता, कानून-राजनीति और अपराध के गठजोड़ के कारण राज्य में निवेश की संभावनाएं खत्म होती चली गई। स्थिति इस हद तक बिगड़ चुकी है कि उद्योगपति बिहार में निवेश के बारे में सपने में भी सोचने से डरने लगे हैं।

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  • Web Title:मंथन के मुद्दे