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युवा पीढ़ी ही लिखेगी बिहार का भविष्य

आगामी 20 अक्टूबर को आयोजित हो रहे ‘हिन्दुस्तान समागम-2009’ के तहत ‘हिन्दुस्तान’ के पटना स्थित कार्यालय में मंगलवार को विमर्श के लिए छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। इस विमर्श में सूबे में शैक्षणिक गुणवत्ता, रोजगार के अवसर और बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ राजनीतिक नेतृत्व और राजनीति में युवाओं के भविष्य पर खुलकर चर्चा हुई। सभी छात्र नेताओं ने स्वीकार किया कि छात्रसंघ चुनाव न होने से बिहार में युवा राजनीति को मंच और सकारात्मक दिशा नहीं मिल सकी है। नतीजतन, सियासत में उनका प्रभावशाली हस्तक्षेप नहीं हो पा रहा है। प्रस्तुत है ‘आवाज’ की दूसरी कड़ी..

प्रतिभा को सही राह पर लाने की जरूरत
सूबे में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जरूरत है उनको सही राह दिखाने की। अगर प्रतिभावान छात्रों का पलायन रोक कर उन्हें यहां पर बेहतर सुविधा उपलब्ध करायी जाए तो निश्चित तौर पर प्रगति का सपना साकार होगा। अभी छात्र विभिन्न वर्गो में बंटकर कार्य कर रहे हैं। विकास के लिए छात्रों को धर्म व जाति से ऊपर उठकर सोचना होगा। सत्ता में भले ही कोई दल आए जब तक वह युवाओं के लिए मौके नहीं बनाएगा तब तक विकास की कल्पना मुश्किल है। उन्हें बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना ही होगा। हालांकि छात्रों की एकता से सरकारें डरती हैं। लेकिन अब छात्र पार्टियों का झंडा ढो़नेवाले बनकर रह गए हैं, इससे बचना होगा।
डा. वरुण कुमार शर्मा, एनएसयूआई

विकास के लिए छात्रों की बात जरूरी
विकास के लिए छात्रों की बात करनी जरूरी है। आज छात्र हित गौण हो गया है। छात्र संगठनों में व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा हावी होने लगी है। केवल छात्रों की बात करने वाले संगठन कम ही बचे हैं। छात्रों का कार्य सत्ता का पिछलग्गू बनना नहीं बल्कि उसका हर स्तर पर विरोध करना होगा। आज तो छात्र संगठन दलों के पीछे हो गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। सरकारें जो सिलेबस तैयार कर रही हैं उसमें कहीं से भारतीयता का बोध नहीं झलकता है। छात्रों की बात करने वाले लोगों से ही विकास की बात की जा सकती है।
डा. प्रेम रंजन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

शिक्षा नीति को बेहतर बनाने की जरूरत
सूबे को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए सबसे पहले नीतियों में बदलाव करना होगा। सरकार की शिक्षा नीति सही नहीं है। स्कूलों में जो शिक्षक नियुक्त हो रहे हैं वे स्तरहीन हैं। उनसे बेहतर शिक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती है। उच्च स्तर की शिक्षा के लिए सरकार के पास कोई एजेंडा ही नहीं है। पटना विश्वविद्यालय से आईएससी की पढ़ाई हटा दी गयी जबकि वहां पर सबसे बेहतर संसाधन मौजूद है। ग्रामीण इलाकों के हाइस्कूल में इंटर स्तर की पढ़ाई शुरू की गयी है जहां इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। इस स्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी और इसका असर आने वाले समाज पर पड़ेगा। सरकार को अभी से इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचना होगा। तभी हम मिशन 2020 की बात कर सकते हैं।
इं. मुकेश कुमार सिंह, छात्र नेता, एनआईटी व पटना विवि

छात्रों के बीच से राजनीतिक शून्यता हटाने की जरूरत
छात्रों के बीच अभी व्यापक राजनीतिक शून्यता का माहौल बना हुआ है। कॉलेज व विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति को प्रथम पाठशाला का नाम दिया जाता है। वहां पर राजनीतिक चर्चाएं बंद हैं। सत्ता व आम आदमी के बीच संवादहीनता की स्थिति है। कैंपस को राजनीति का केंद्रविंदु माना जाता है और वहां के छात्रों में छात्र आंदोलन के प्रति उदासीनता की स्थिति है। सीनेट व सिंडिकेट में छात्र प्रतिनिधि नहीं हैं। कक्षा व प्रायोगिक कक्षाएं नहीं हो रही हैं। ट्यूटोरियल क्लास का मतलब कई शिक्षक नहीं समझ रहे हैं। छात्रों को संवारने का मतलब है नई पीढ़ी को दिशा देना। पर इस पीढ़ी के समक्ष विचारों का सर्वथा अभाव है। उनके रोल मॉडल गांधी, नेहरू, जेपी, सुभाष, भगत सिंह, मार्क्स, लेनिन की जगह अब अमिताभ बच्चान, धोनी, शाहरुख व मल्लिका हो गए हैं। इस स्थिति को दूर करने के लिए छात्र संगठनों को छात्रों के बीच राजनीतिक चेतना विकसित करनी होगी।
अभिनव कुमार अकेला, राज्य अध्यक्ष, एआईएसएफ

नाउम्मीद नहीं हैं हम
छात्र नाउम्मीद नहीं है। विकास के मार्ग पर बिहार आगे बढ़ेगा। भले ही इसके लिए कुछ समय लगे लेकिन विकास की बात को नकारा नहीं जा सकता। मिशन 2020 की बात को भी छात्रों से जोड़कर देखा जाना जरूरी है। अभी के छात्र 10 वर्ष बाद सूबे की तकदीर का निर्धारण करने वाले होंगे। उन्हें एक बेहतर माहौल उपलब्ध कराना वर्तमान सत्ता की जिम्मेवारी होनी चाहिए। हालांकि इसके लिए छात्रों को एक मंच पर आना होगा और उन्हें संघर्ष में बराबर का साझीदार बनना पड़ेगा। छात्रों को अपनी सुविधाएं लड़कर हासिल करनी होगी। बेहतर सुविधा का अभाव है लेकिन संसाधनों को मजबूत कर एक बेहतर ढांचा तो तैयार करना ही होगा।
मो. तनवीर अहमद, प्रदेश महासचिव, छात्र राकांपा

बदलनी होगी शिक्षण संस्थानों की भूमिका
शिक्षण संस्थानों की भूमिका बदलनी होगी। सरकार को सबको शिक्षा का अधिकार देना होगा। अभी जो स्थिति है उसमें सबको शिक्षा का अधिकार नहीं मिल पा रहा है। समान स्कूल प्रणाली को लागू करने की बात नहीं की जा रही है। साथ ही छात्रसंघ के चुनाव के सवाल पर भी सब चुप हैं। विश्वविद्यालय एडमिशन व परीक्षा के केंद्र बनकर रह गए हैं। जब तक वहां राजनीतिक व वैचारिक हलचल शुरू नहीं होती तब तक हम समग्र शिक्षा की कल्पना नहीं कर सकते। केंद्र सरकार ने शिक्षा का विधेयक पास तो किया लेकिन उससे अधिक उम्मीद नहीं लगती। मिशन 2020 में छात्रों की सामूहिक भूमिका होगी। भले ही युवाओं के रोल मॉडल बदल रहे हैं लेकिन इसके लिए हमें एक समेकित प्रयास करना होगा।
सुशील कुमार, जिला सचिव, एआईएसएफ

सूबे के विकास के लिए युवा नेतृत्व बढ़ाना जरूरी
सूबे के विकास के लिए युवा नेतृत्व को बढ़ाना जरूरी है। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम ने बिहार को मिशन 2020 का नारा दिया और इसमें युवाओं की एकजुटता को जरूरी बताया। आजादी के समय या जेपी आंदोलन ने देश व सूबे को नेतृत्व दिया लेकिन अब नेतृत्व शून्यता का दौर शुरू हो गया है। बिहार में क्रमिक विकास शुरू हुआ है और कई नए शैक्षिक संस्थान खुले हैं। लेकिन छात्रों को अपने को पार्टियों की धुरी से अलग करना होगा। महाराष्ट्र मुद्दे पर छात्र एक हुए थे लेकिन कुछ पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने आंदोलन को बंद कराने में बड़ी भूमिका निभाई। छात्र आंदोलन की हम बात तो करते हैं लेकिन इसकी शिथिलता के हम ही जिम्मेदार हैं। छात्र संगठनों को मिलकर मिशन 2020 के लिए एक कार्यक्रम तैयार करना होगा।
अरविंद निषाद, प्रदेश अध्यक्ष, छात्र जदयू

राजनीति को जनपक्षीय बनाना जरूरी
राजनीति को जनपक्षीय बनाना जरूरी है। आज की राजनीति से आम लोग गायब होते जा रहे हैं। मुद्दों की बात नहीं हो पा रही है। वक्त नजदीक है लेकिन अभी यह हमारे हाथों में है। सत्ता अगर छात्रों को सही दिशा देने का प्रयास करे और उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार किया जाए तो निश्चित तौर पर विकास की बात की जा सकती है। राजनीति मुद्दों पर आधारित होनी सबसे जरूरी है। इसके अलावा जरूरतमंदों के लिए भी राजनीति को मोड़ना होगा। समाज में रोजगार, स्वास्थ्य व संस्कृति का मामला उभर कर सामने आया है। अगर विकास की बात हम करते हैं तो इसके लिए राजनीति को जनता के पक्ष में मोड़ना जरूरी होगा। छात्रों को भी राजनति आम छात्रों के हित को देखकर ही करनी चाहिए।
विश्वजीत, राज्य उपाध्यक्ष, एआईएसएफ

शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाना जरूरी
सूबे में शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाना जरूरी है। अभी विश्वविद्यालयों में शिक्षा पर दबाव बनाने के लिए छात्रों के हाथ में कोई ताकत नहीं है। सरकार जब तक शिक्षा की प्रणाली को बेहतर नहीं बनाती है तब तक समाज का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। छात्रसंघ का चुनाव अभी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसे बगैर कैंपस लोकतंत्र को स्थापित करा पाना संभव नहीं हो पाएगा। शिक्षा प्रणाली की कमजोरी के कारण सूबे की प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है। प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में बेहतर शिक्षक नहीं हैं। जिन शिक्षकों की बहाली स्कूलों में हुई है उनमें गुणवत्ता का सर्वथा अभाव है। प्रतिभा के पलायन का लाभ दूसरे राज्यों को हो रहा है। अगर सूबे में बेहतर संस्थान स्थापित हों तो प्रतिभा यहीं रहेगी और पूंजी का पलायन भी रूकेगा। शैक्षणिक व प्रशासनिक ढांचा को बेहतर बनाकर ही हम विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
उपेंद्र यादव, छात्र राकांपा

विकास के लिए ईमानदार प्रयास जरूरी
सूबे को अगर हम 2020 तक विकसित देखना चाहते हैं तो इसके लिए ईमानदार प्रयास जरूरी है। राजनीति से ऊपर उठकर राज्य हित में नेताओं को सोचना होगा। सूबे की वर्तमान स्थिति से यह संभव नहीं दिखता। सत्ता महज दिखावा करने में लगी हुई है। जल प्रबंधन को बेहतर बनाकर सूबे का विकास संभव है। विज्ञान एवं तकनीक के इस युग में हमारा देश सबसे पीछे है। गौरवशाली अतीत वाला हमारा राज्य का वर्तमान वीभत्स दिखता है। 74 आंदोलन के नेतागण परिवारवाद में लिप्त हो गए हैं। सरकारी शिक्षण संस्थानों की स्थिति बदहाल है। कहीं भवन का अभाव तो कहीं शिक्षक का। जहां शिक्षक हैं, वे मध्याह्न् भोजन योजना में लगे हैं। इस स्थिति में भविष्य अंधकारमय नजर आता है। छात्र जाति व्यवस्था में बंट गए हैं। राजनीति व्यवस्था सड़-गल गयी है लेकिन विकास की किरण दिखाई अवश्य पड़ती है।
स्वदेश कुमार, प्रदेश अध्यक्ष, छात्र राजद

सूबे के विकास में सबसे बड़ा बाधक भ्रष्टाचार है। मीडिया को अपने कर्तव्यों का निर्वहन सही तरीके से करना चाहिए। न्यायालय की व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। देश के विकास में युवाओं की भागीदारी जरूरी है। दलों को अपने युवा विंग की ताकत का इस्तेमाल करना होगा। शिक्षा के गिरते स्तर में सुधार की आवश्यकता है। इससे ही मिशन 2020 को पूरा किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर कर व युवाओं के बीच से जातीय भावना को समाप्त कर ही हम नए बिहार की कल्पना कर सकते हैं।
डा. धनंजय यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, छात्र रासपा

2020 में बिहार कैसा होगा। उसकी अपेक्ष मौजूदा सवाल यह है कि बिहार आज क्या है? खगड़िया नरसंहार ने यह साबित कर दिया कि बिहार में जनपक्षीय विकास का रास्ता भूमि सुधार से ही संभव है। लेकिन नीतीश सरकार इस सुधारवादी कार्यक्रम को भी लागू नहीं करना चाहती। विपक्ष की सत्ताधारी पार्टिया भी खामोश हैं। इसलिए जनता का जुझारू आंदोलन ही बिहार की बदली हुई तस्वीर सामने ला सकता है। छात्र-नौजवानों को एक मंच पर आना होगा। छात्र नेताओं को अपने बड़े नेताओं के प्रति विद्रोह करना होगा। अगर अभी आंदोलन की शुरुआत नहीं हुई तो बाद में समय खत्म हो जाएगा।
आइसा के राज्य सचिव अभ्युदय कुमार

शिक्षा व्यवस्था में सुधार किये बिना 2020 तक सूबे का विकास संभव नहीं है। यहां की शिक्षा प्रणाली दो तरह की हो गई है एक कॉरपोरेट सेक्टर की शिक्षा और दूसरी किसानों के बच्चों को मिलनी वाली शिक्षा। इस बीच की खाई को जब तक समाप्त नहीं किया जाएगा विकास संभव नहीं  है। छात्र संगठनों का कोई प्लेटफॉर्म नहीं है। छात्रों को अपनी आवाज को मुखर तरीके से उठाने के लिए एक प्लेटफॉर्म होना चाहिए जो हमें बनाना होगा। छात्र नेताओं को एक सीमा के अंदर बांध दिया गया है। इस बेड़ी को तोड़ने के लिए छात्रों को जाति-धर्म से उपर उठकर सोचना होगा। 25 वर्षो से नहीं हुए छात्र संघ के चुनाव के लिए सभी को एकजुट होकर प्रयास करना होगा।
अजित शक्तिमान, छात्र राजद

भूमि सुधार और कॉमन स्कूल सिस्टम की सिफारिशें यदि लागू होती हैं तो सचमुच बिहार में सच्चे अर्थो में विकास के रास्ते खुलेंगे। मुख्य धारा की तमाम पार्टियां पुरानी ताकतों की हिफाजत कर रही है और नई ताकतों व छात्र-युवाओं को आगे आने नहीं देना चाहती। इस बेरीकेट को तोड़कर ही कोई बदलाव संभव है। छात्र-युवाओं को मजदूर-किसानों के आंदोलन से जुड़ना होगा। वर्तमान समय में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई और छात्र-युवाओं के मामले में विकास का ग्राफ बढ़ा है। छात्रों को अपने एजेंडा को सही दिशा देने के लिए एक साथ इंकलाब का नारा देना होगा। अपनी ताकत को छात्र-युवाओं को खुद पहचानने की जरूरत है।
कुमार परवेज, आइसा

बिहार में वृहत पैमाने पर बदलाब की जरूरत है। बगैर बदलाव के विकास संभव नहीं है। राजनीतिज्ञ से लेकर आम लोगों को अपनी जिम्मेवारी लेनी होगी। आज शिक्षक पूरी तरह से प्रोफेशनल हो गए हैं। उन्हें समाज और देश की चिंता नहीं है। अगर समय रहते इसे खत्म नहीं किया गया तो बिहार की स्थिति और खराब हो जाएगी। छात्र प्रतिनिधि को भी अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी। सूबे के विश्वविद्यालय में जातिय आधार पर राजनीति को समाप्त करना होगा। स्कूलों और विश्वविद्यालयों की स्थिति में सुधार के बिना 2020 का मिशन को पूरा नहीं किया जा सकता है। सभी पार्टियों के आला आधिकारियों को छात्र विंग को आगे बढ़ना चाहिए। छात्रों का नेतृत्व करने के लिए प्लेट होना जरूरी है।
एनएसयूआई के महासचिव दीपक प्रकाश

बिहार की राजनीति में आज जो मुख्य भूमिका में हैं वे सभी छात्र राजनीति की उपज हैं। वे जानते हैं कि अगर छात्रसंघ को बढ़ावा दिया गया तो उनको प्रतिस्पर्धा देने के लिए युवा चेहरे उनके सामने आ जाएंगे। इस कारण वे नहीं चाहते हैं कि कोई छात्र नेता आगे बढ़े। सभी वरीय नेता छात्रों का इस्तेमाल करना चाहते हैं। आज छात्र कल्याण बोर्ड के गठन की बात कोई नहीं करना चाहता है। राजनीति में परिवारवाद हावी हो रहा है चाहे राष्ट्रीय स्तर पर देखें या राज्य स्तर पर। इस स्थिति को समाप्त कर आम छात्रों को बढ़ावा दिए बगैर विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक हीन भावना से ग्रस्त हैं क्योंकि चपरासी का वेतन शिक्षक से अधिक है। मिशन 2020 के लिए स्थिति को बदलनी होगी।
छात्र राकांपा के प्रदेश अध्यक्ष रोहित कुमार

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर विकास संभव नहीं
वर्तमान स्थिति को देखकर नहीं लगता कि मिशन 2020 का सपना साकार हो सकेगा। खिचड़ी स्कूल व नवोदय विद्यालय के बीच की खाई को पाटना अभी मुश्किल लगता है। बिहार में भूमि सुधार व्यवस्था को लागू किए बगैर विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। सूबे के विश्वविद्यालयों में अराजक स्थिति को समाप्त किए बगैर शिक्षा का विकास संभव नहीं है। शिक्षा को विकसित किए बगैर मिशन 2020 हमारे लिए सपना ही होगा। सरकार को सभी स्तरों पर सुधार करना होगा और इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे लेकिन इस प्रकार की कार्रवाई अभी संभव नहीं दिख रही है। छात्रसंघ का चुनाव को कराने के लिए राजनीतिक दलों व छात्र संगठनों को एक मंच पर आना होगा।
मरकडेय पाठक, आइसा

पुरानी शिक्षा पद्धति को बदलकर ही होगा विकास
भविष्य युवाओं का है और इसके लिए युवाओं को ही आगे बढ़ना होगा। युवाओं को अपने आप में बदलाव लाना होगा। उन्हें अपने शैक्षणिक व वैचारिक स्तर पर सोच को बदलना होगा। पुरानी शिक्षा पद्धति को बदल कर हमें नए व आधुनिक शिक्षण प्रणाली को लागू करना होगा। इसमें हमें तुष्टिकरण की नीति से बचना होगा। बिहार में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। बस उसे व्यवस्थित करने की जरूरत है। जल संसाधन के जरिए हम विश्व स्तर पर अपनी पहचान कायम कर सकते हैं लेकिन उसके लिए सही दिशा में प्रयास करना होगा। हम सूबे के भविष्य हैं और हमें अपनी क्षमता को पहचानना होगा। छात्र किसी भी देश की सत्ता को बदल सकते हैं।
सीमांत पटेल, भागलपुर विवि के पूर्व अध्यक्ष, एबीवीपी

कानून व्यवस्था
सूबे में भूमि सुधार को लागू किए बगैर कानून व्यवस्था को ठीक करना मुश्किल है। खगड़िया के नरसंहार ने दिखा दिया है। विश्वविद्यालयों में व्यवस्था को ठीक करने के लिए छात्र संघ का चुनाव कराना जरूरी है।

शिक्षा
प्रयोगों के नाम पर शिक्षा को ध्वस्त किया जा रहा है। स्कूलों में अभी इंटर की पढ़ाई की संरचना ठीक से विकसित नहीं हुई और कॉलेजों से इंटर शिक्षा को हटा दिया गया। इससे आम छात्रों को काफी परेशानी हो रही है।

इंफ्रास्ट्रक्चर में कमी
विश्वविद्यालयों में अभी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। कई कॉलेजों में न ढंग की प्रयोगशालाएं है और न ही पुस्तकालय। राजधानी से दूर हटिये तो कॉलेजों के भवन भी मुकम्मल नहीं हैं। इस स्थिति को बदलना होगा।

जातिवाद
छात्रों को तरह-तरह के बेड़ियों में बांध दिया गया है। जाति के नाम पर भी उन्हें गोलबंद करने की कोशिश लगातार जारी है। इन बेड़ियों को तोड़े बगैर छात्रों का सर्वागीण विकास मुश्किल है। जातिवाद को तोड़ने के लिए छात्रों को राजनीतिक चेतना से लैस करना होगा।

पाठकों के एसएमएस

किसी भी राज्य के विकास के लिए ऊर्जा की जरूरत पूरी होनी चाहिए। प्रदेश में बिजली की व्यवस्था चरमराई हुई है। इसे दुरूस्त किया जाना जरूरी है। - कमल मिश्र, चंद्रपुरा, बक्सर

योग्य युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें। टुच्चे राजनेता भी प्रदेश के विकास में बड़ी बाधा हैं। अशिक्षा तो प्रदेश की बड़ी समस्या है हीं। - अनाम

मेरे विचार से बिहार की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है जातिवाद। आप कोई भी काम कर रहे हों या करवा रहे हों आपकी जाति जरूर पूछी जाती है। - मो. असजद, संग्राम, मधुबनी

भ्रष्टाचार खत्म किए बिना प्रदेश का विकास संभव नहीं है। यह बिहार ही नहीं बल्कि देश के विकास के लिए जरूरी है। - निधि कुमार सिंह, लहेरियासराय, दरभंगा

पहली जरूरत है रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना। प्रदेश के खिलाड़ियों को नौकरी और पेंशन की बात सोचनी चाहिए। - करार खान, ज्वाइंट सेक्रेटरी, भागलपुर जिला कबड्डी एसोसिएशन।

शिक्षा के नाम पर जो शिक्षा मित्र रखे गए हैं उनसे क्या पढ़ाई का स्तर सुधर सकता है? अगर नहीं तो क्या ऐसे फैसले कल्याणकारी होते हैं? - शेखर कश्यप, कटिहार

कानून व्यवस्था की हालत में सुधार जरूरी है। इससे हम अपनी हालत कुछ बेहतर कर सकते हैं। रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।- मो. सिकंदर हयात, बड़ा सुमेरा, कुरन्नी, मुजफ्फरपुर

व्यवस्था में सुधार तब तक नहीं होगा जब तक राजनेता नहीं सुधरेंगे। इसी बीमारी का असर नौकरशाही पर भी है। बिना पैसे के एक काम नहीं होता। - अनाम

मेरा मानना है कि सिर्फ शिक्षा में सुधार की बात करने से काम नहीं चलेगा। सबसे बड़ी चुनौती है जातिवाद पर काबू पाना। कानून व्यवस्था भी एक समस्या है। - सूरज, भागलपुर

युवाओं को राजनीति में आना चाहिए। जातिवाद के दायरे से बाहर आना काफी जरूरी है। इसने प्रदेश का बंटाधार कर रखा है।  - शंकर, पोस्टल कालोनी, आगमपुर, भागलपुर

खाकी और खादी दोनों में सुधार जरूरी है। पुलिस से लोग सुरक्षित कम असुरक्षित ज्यादा महसूस करते हैं। क्या ऐसे में बेहतर बिहार बन पाएगा?  - गुरमीत सिंह, सासाराम

भ्रष्टाचार और अशिक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। विकास के लिए सबसे पहले इसमें सुधार जरूरी है। इसके बिना एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सकता है। - चंपक पेरिवाल, फारबिसगंज

यह सच है कि बिहार को जहां होना चाहिए था वहां नहीं है। पिछले कुछ समय में बिहार सुधरा तो है पर अभी मंजिल काफी दूर है। - राजा दिनकर, लोची, मुंगेर

दलगत और जातिगत दायरे से बाहर आकर सबको प्रदेश के कल्याण के लिए मजबूत होकर प्रयास करना होगा। - मनीषा आनंद, जमालपुर

शिक्षा को सियासत से दूर रखना चाहिए क्योंकि इससे भविष्य चौपट हो जाएगा। प्रदेश तभी सुधरेगा जब इसकी नई पीढ़ी सुधरेगी। - मनीष कुमार मिश्र, ठाकुरबाड़ी मुहल्ला, जहानाबाद

सबसे जरूरी है लोगों की सोच में बदलाव। विकास के लिए साथ आकर मजबूत इरादे से काम करने की जरूरत है। - राजू यादव, आरा

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