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जमीनी बदलाव से बदलेगी बिहार की तस्वीर

आगामी 20 अक्टूबर को आयोजित हो रहे ‘हिन्दुस्तान समागम-2009’ के तहत हम शुरू कर रहे हैं समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के साथ विमर्श। इस सिलसिले में हमने हिन्दुस्तान कार्यालय पटना में सोमवार को आमंत्रित किया राजनीतिक दलों के लोगों को। इनमें शामिल रहे भाकपा के यूएन मिश्र, माकपा के विजयकांत ठाकुर, सारंगधर पासवान, भाजपा के विनोद नारायण झा, राजद के आलोक मेहता, जदयू के उपेन्द्र प्रसाद, भाकपा माले के धीरेन्द्र झा, कांग्रेस के अशोक चौधरी और लोजपा के अच्युतानंद। इस विमर्श में अतीत के सबक, वर्तमान के स्वरूप और भविष्य के बिहार की संकल्पनाओं और संभावनाओं पर पार्टी हितों से ऊपर उठकर मंथन किया गया। सभी नेताओ ने एक स्वर से माना कि राज्य में कानून-व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, मानव संसाधन, जल प्रबंधन, भूमि प्रबंधन, कृषि क्षेत्र और कृषि आधारित उद्योगों के रास्ते ही बिहार वर्ष 2020 तक एक विकसित राज्य का दर्जा हासिल कर सकता है। प्रस्तुत है बिहार की इस ‘आवाज’ की यह पहली कड़ी।

कानून व्यवस्था को दुरुस्त किये बिना विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए यह पहली शर्त है।

अशिक्षा विकास में बड़ी बाधा है। राजनीति में भी शिक्षित लोग आएं तभी विकास की पहल होगी। शिक्षा के विकास, शिक्षण संस्थाओं की गरिमा भी बहुत जरूरी है।

राज्य में इन्फास्ट्रक्चर की बहुत कमी है। बिजली और सिंचाई की व्यवस्था सबसे पहली जरूरत है। इसके अलावा भी सभी क्षेत्रों में संरचनात्मक विकास जरूरी है।

जातिवाद से विकास अवरुद्ध होता है। जाति व परिवार के नाम पर राजनीतिज्ञ सत्ता पर कब्जा जमा लेते हैं। इस व्यवस्था को दूर किए बिना विकास संभव नहीं है।

जातिवाद से ऊपर उठें
जाति से ऊपर उठे बिना विकास की कल्पना बेमानी है। जाति व्यवस्था विकास में सबसे बड़ी बाधा है। हमारा मानना है कि नये लोग ज्यादा ईमानदार हैं। पढ़े लिखे नौजवानों को भी राजनीति में आना होगा। आज हर व्यक्ति अपने बच्चों को डॉक्टर और इन्जीनियर बनाना चाहता है। कोई उन्हें राजनीति में लाना नहीं चाहता। इसका मूल कारण है भ्रष्टाचार और जातिवादी व्यवस्था। इस भावना को तोड़ना होगा। आज जो नये लोग राजनीति में आते भी हैं वे अपने माता-पिता की विरासत संभालते हैं। लेकिन नये परिवार के पढ़े- लिखे युवक राजनीति में नहीं आना चाहते। नतीजा यह है कि जो विधायक बजट पास करते हैं उनमें अधिसंख्य को बजट की जानकारी नहीं होती। वे आंख मूंद कर दलीय प्रतिबद्धता के अनुसार बजट के पक्ष और विपक्ष में अपना वोट देते हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है इसे दूर करना होगा।
अशोक चौधरी, कांग्रेस नेता

बदलनी होगी मानसिकता
राज्य में विकास की अपार संभावनाएं हैं। नई पीढ़ी को तो राजनीति में लाना ही होगा। साथ ही नेताओं और वोटरों की मानसिकता भी बदलनी होगी। बड़ी योजनाएं वोट पैदा नहीं कर पाती हैँ। व्यक्तिगत लाभ वाली छोटी योजनाएं ही वोट की राजनीति में लाभदायक साबित होती हैं। इस मानसिकता को बदलना होगा। राज्य की मिट्टी उपजाऊ है लोग भी मेहनती हैं। इन दोनों एसेटों का भरपूर दोहन करना होगा। दुनियां में पानी पेट्रोल से महंगा होने वाला है और हमारे यहां इसकी अधिकता है। जल प्रबंधन कर हम आमदनी बढ़ा सकते हैं। भूमि प्रबंधन का बहुत बुरा हाल है। इस कारण सबसे ज्यादा पैसा भूमि से जुड़े मुकदमों में खर्च होता है। सारे रेकार्डो को कम्प्यूटराज्ड कर व्यवस्था में सुधार किया जा सकता है। बिहार के बैंकों में विकसित राज्यों से ज्यादा पैसा जमा है। लेकिन वह राशि विकास में न लगाकर दूसरे राज्यों के विकास में लग रही है। आज भी हमारा सीडी रेसियो 30 से 35 प्रतिशत तक ही है।
यूएन मिश्र, भाकपा नेता

सामंती विचारधारा पर कसें लगाम
सामंती विचारधारा विकास को रोकता है। यह पहला राज्य है जहां भूमि सुधार का कानून बना लेकिन लागू नहीं हो सका। आधी से अधिक जमीन बाढ़ प्रभावित है। प्रकृतिक की मार हम हर वर्ष झेलते हैं। लेकिन विकास में सबसे बड़ी बाधा है राजनीतिज्ञों और अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार। शिक्षा के विकास का प्रयास जरूरी है। हमारे पास संपत्ति बहुत है। नेताओं के पैसे बैंकों में जमा है लेकिन उसका निवेश बिहार में नहीं होता है। हमारे पैसे से दूसरे राज्यों का विकास होता है। कमिटमेंट का अभाव भी विकास को रोकता है। इन सब बुराइयों को दूर करने के लिए इच्छाक्ति को मजबूत करना होगा। इसके बिना विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। विकास के अभाव में हमारी शिक्षण संस्थाओं की गरिमा भी गिरी है। पटना विश्वविद्यालय की एक अलग पहचान थी लेकिन धीरे-धीरे इसकी गरिमा गिरती जा रही है।
धीरन्द्र झा माले नेता

भूमि सुधार जरूरी
गुजरे जमाने की याद और वर्तमान की अनुभूति से अनुभव लेकर विकास की नई लकीर खींची जा सकती है। भूमि सुधार तो जरूरी है। यह विकास की पहली कड़ी है। लेकिन राज्य से बाहर जा रहे पैसे को भी रोकने की व्यस्था करनी होगी। केवल मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों में जो छात्र जाते हैं उससे दो हजार करोड़ रुपया हर वर्ष बाहर चला जाता है। छात्रों के लिए राज्य में शिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था कर इस पैसे को बिहार में रोका जा सकता है। इससे दूसरे राज्यों के छात्र भी यहां पढ़ने आयेंगे और हमारी आमदनी बढ़ेगी। किसानों की क्रय शक्ति बढ़े इसकी व्यवस्था करनी होगी। आधारभूत संरचनाओं का बुरा हाल है। बिजली और सिंचाई की व्यवस्था सबसे पहले जरूरी है। कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार जरूरी है। इसके बिना विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
सारंगधर पासवान माकपा नेता

बाधक बनी हुई है सिद्धांतहीन राजनीति
केन्द्र सरकार ने राज्य के साथ हमेशा बेईमानी की है। पहले पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक बिहार को उसका हक नहीं मिला। विकास के लिए आधारभूत संरचना की जरूरत होती है लेकिन इसका बुरा हाल है। सड़कें पटना में भले बनीं हों लेकिन गांवों में इसका फैलाव नहीं हुआ है। पटना से बाहर जो पुरानी सड़कें हैं उनका भी बुरा हाल है। बिजली बनाने की कोई योजना ही नहीं है। बिहार पहला राज्य है जहां भूमि सुधार के लिए कानून बने लेकिन इसे लागू करने में यह राज्य सबसे फिसड्डी साबित हुआ। बिहार के विकास की राह बटाईदारों को स्वामित्व दिलाने से होकर गुजरती है। बंदोपाध्याय कमेटी ने काई नई बात नहीं कही है। लेकिन वोट की राजनीति में यह मामला फंसकर रह गया है। सिद्धांतहीन राजनीति विकास में बाधक है। नौजवान राजनीति में आयें तो बेहतर होगा, लेकिन उन्हें प्रत्यारोपित तो किया नहीं जा सकता। किसानों की आमदनी बढ़ानी होगी। इससे उनमें क्रय शक्ति बढ़ेगी। सिद्धांतहीन राजनीति ने विकास का बंटाधार कर दिया है। जब तक नेताओं का नैतिक विकास नहीं होता है तब तक विकास की राह में तमाम बाधाएं खड़ी होती रहेंगी और उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
विजयकांत ठाकुर माकपा नेता

मानवीय संसाधन का उपयोग हो
विकास सापेक्ष शब्द है। इसको सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। लेकिन स्वास्थ्य, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी जरूरतों को तो सबसे पहले पूरा करना होगा। भूमि पर निर्भरता कम करना जरूरी है। इसके लिए स्कील डवलपमेंट जरूरी है। जल प्रबंधन, रोजगार का सृजन, भ्रष्टाचार पर अंकुश, निवेश की पहल और विधि व्यवस्था विकास के लिए सबसे जरूरी पहलू हैं। दुनियां में जो धारणा बन रही है हमें वहां पहुंचना होगा। राजनीति में परिवारवाद और जातिवाद पर अंकुश लगाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। प्राय: यह देखा जाता है कि हमारी व्यवस्था में दोष का लाभ उठाकर कुछ जातियां और कुछ परिवार के लोग सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं। इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए पहल करनी होगी। लाभ घाटे की चिंता किये बिना। भूमि सुधार भी बहुत जरूरी है। अब तक बिहार में चकबंदी का काम भी हम पूरा नहीं कर सके हैं।
बिनोद नारायण झा, भाजपा नेता

करना होगा ईमानदार प्रयास
समग्र विकास सिर्फ बातों और नारों से नहीं हो सकता। इसके लिए ईमानदार प्रयास करना होगा। केन्द्र से मिली धन राशि का उपयोग ठीक से नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण उद्योग के साथ कृषि पर बल देना सबसे जरूरी है। लेकिन इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह मानसिकता विकास में सबसे बड़ी बाधा है। कानून व्यवस्था की समस्या सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी है। इसे दुरुस्त करना होगा। बड़ा समय हाथ से निकल गया और अब तक बिहार में एक सूई का कारखाना भी नहीं लग सका। पिछले दिनों में एक क्रांति आई थी वह है दबे-कुचले लोगों का मान सम्मान बढ़ाने की। विकास के लिए यह सबसे बडा़ आधार बना था। लेकिन उस माहौल को सुरक्षित नहीं रखा जा सका। बड़ी बाधा यह है कि विकास के लिए कोई मॉडल भी अब तक यहां तैयार नहीं हो पाया है। पढ़े लिखे लोग राजनीति में आयें यह अच्छी बात है लेकिन गरीबों का प्रतिनिधित्व छूट न जाए।
आलोक मेहता राजद नेता

प्रति व्यक्ति आय बढ़ाई जाए
विकास के मामले में बिहार देश में 32 वें पायदान पर खड़ा है। भ्रष्टाचार और कानून व्यस्था की समस्या यहां बहुत बड़ी है। इस समस्या को दूर कर प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की जरूरत है। यह भी सच है कि बिहार को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला लेकिन केन्द्र सरकार ने जो दिया उसका भी भपूर उपयोग नहीं किया गया। विकास करने के लिए कृषि आधारित उद्योगों को बढा़वा देना होगा और शिक्षा का विकास करना होगा। संरचनात्मक सुविधाएं भी बहुत कम हैं। वोट की चिंता में पड़ी सरकारें कभी विकास की बात नहीं सोच सकती। बिना लाग लेट के पंचायती राज व्‍यवस्था को मजबूत कर दिया जाए तो विकास की एक नई रेखा खिंच सकती है। भूमि सुधार सबसे जरूरी है। खेत जोतने वाले को स्वामित्व मिले यह बुनियादी जरूरत है। राजनेता और अधिकारी दोनों में भ्रष्टाचार है। यह विकास में सबसे बड़ी बाधा है। इसको समाप्त कर ही विकास की कल्पना की जा सकती है।
प्रो. अच्युतानंद लोजपा नेता

परिवर्तन की लड़ाई लड़ें
केन्द्र का सौतेला व्यवहार राज्य के विकास में बड़ी बाधा है। हमारी 40 प्रतिशत प्राकृतिक संपदा राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दी गई है। इसकी कीमत भी केन्द्र सरकार ही निर्धारित करती है। इसके विपरीत समुद्र के किनारे बसे राज्यों की संपदा राष्ट्रीय संपत्ति नहीं घोषित की गई। पंजाब को हरित क्रांति के लिए अलग से पैसा दिया गया। लेकिन उसके उत्पाद को राष्ट्रीय संपत्ति नहीं घोषित की गई। पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आयें यह जरूरी है लेकिन ज्यादा जरूरी है कि उनके नैतिक स्तर का ख्याल रखा जाए। ऊर्जा, यातायात, श्रमशक्ति को विकसित करना होगा। कृषि आधारित उद्योग लगे और पावर उत्पादन के लिए बेहतर व्यवस्था हो तो विकास करने में कोई परेशानी नहीं होगी। एक और परेशानी यह है कि हम परिवर्तन की लड़ाई की जगह बदले की लड़ाई लड़ने लगते हैं। इससे विकास प्रभावित होता है। वर्ग संघर्ष को जातीय संघर्ष में बदलने वाली शक्तियों को कमजोर करना होगा।
उपेन्द्र प्रसाद जदयू नेता

‘बिहार के विकास के समक्ष चुनौतियां’ विषय पर प्रदेश के कोने-कोने से खूब एसएमएस और फैक्स आए। स्थान के अभाव में हम हिन्दुस्तान दैनिक में सबको स्थान नहीं दे पाए हैं, पर जो मुद्दे मुख्य रूप से निकलकर आए उनमें अशिक्षा, जातिवाद, भ्रष्टाचार, जातिवाद, पलायनवादी सोच, बेरोजगारी प्रमुख हैं। मुंगेर से विकास, राजीव और कविता, भागलपुर से राजीव, मोहन, संगीता और ज्योति के भी एसएमएस पसंद किए गए। इनके अलावा पूर्णिया से संजीत, रुचि, जरीन, मुजफ्फरपुर से नरेंद्र, मुकेश, संजीव और चंद्रमोहन के भी एसएमएस बेहतर थे। इनमें उन्होंने सूबे के समक्ष चुनौतियों का जिक्र किया है।

मेरे विचार से सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। अगर इस पर अंकुश लगाया जाए तो कई समस्याएं खुद ही हल हो जाएंगी।
रमेश सिन्हा राजाबाजार, मोतिहारी

बिहार में शिक्षा की रीढ़ तोड़ दी गयी है। शिक्षा मित्र के नाम पर ऐसे लोगों को बहाल किया गया है कि उनसे शिक्षा का कल्याण तो कतई नहीं हो सकता।
पिंकू परसा, बड़हरा कोठी, पूर्णिया

सुधार की शुरूआत युवा पीढ़ी से करनी होगी ताकि सूबे का भविष्य बेहतर बने क्योंकि कल का निर्माण तो प्रदेश के इसी वर्ग को करना है।
रौशन झा दरभंगा

सरकार-शासन को ऐसी कोशिशें करनी होंगी ताकि प्रदेश की खोयी हुई प्रतिष्ठा वापस मिल सके और उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाए।
डा. निरंजन कुमार बिहार शरीफ

आखिर भ्रष्टाचार का मुद्दा किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में शामिल क्यों नहीं है? कानून-व्यवस्था, जातिवाद आदि भी गंभीर मामले हैं।
जीएल मनीषी दानापुर, पटना

अगले दशक में बिहार के विकास में जातिवाद, भ्रष्टाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी मुख्य रूप से चुनौती है।
आरबी गोप पीरमुहानी, पटना

नक्सली और जातीय हिंसा ने भी प्रदेश के विकास को अवरुद्ध किया है। सरकार को नेक नीयत और मजबूती से काम करना होगा।
निधि कुमार सिंह हाउसिंग कालोनी, लखीसराय

अगर सूबे के विकास में कोई सबसे बड़ी चुनौती है तो वह है जातिवाद की। इसने बिहार को बुरी तरह से बीमार बना रखा है।
रंजीत कुमार शिक्षक, पटना

मेरे विचार से बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा तो बेरोजगारी है। कानून-व्यवस्था आदि जैसी चीजें सब इसी से जुड़ी हैं।
कल्पना मुजफ्फरपुर

बिहारियों की पलायनवादी सोच मेरे विचार से सबसे बड़ी समस्या है। अगर अपनी धरती पर बिहारी टिक जाएं तो चमत्कार हो जाएगा।
इंजीनियर भारत भूषण द क्वालीफायर, पूर्णिया

यह सच है कि सूबे के विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भ्रष्टाचार ही है। सबसे पहले इसे दूर करना होगा। इसके बाद ही विकास की बात सोची जा सकती है।
नागेंद्र ओटी पाड़ा, कटिहार

भ्रष्टाचार ने इस प्रदेश का सत्यानाश कर दिया है। वरना जिस बिहार का नाम पूरी दुनिया में है हम उसकी दुर्दशा पर चर्चा नहीं कर रहे होते।
एन ठाकुर, रिटायर्ड विंग कमांडर, दरभंगा

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  • Web Title:जमीनी बदलाव से बदलेगी बिहार की तस्वीर