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जैसे दीपक वैसी दीपावली

त्योहार समाज को नहीं चलाते, बल्कि समाज त्योहारों को चलाता है। त्योहार कोई ठोस चीज तो है नहीं कि वह अपने को स्थापित, पुनस्र्थापित करने की कोशिश करे। वह हमारे संस्कारों में बसता है और कोई भी संस्कार ऐसा नहीं है, जो बदलते हुए समय से प्रभावित न होता हो। इसलिए त्योहार भी समय के अनुसार बदलते जाते हैं। दुनिया के सभी प्रमुख त्योहारों की तरह अगर दीपावली के साथ भी ऐसा होता है, तो इसमें हैरत की बात क्या है।

दीपावली पर्व से ज्यादा उत्सव है। एक खेतिहर सभ्यता का महत्वपूर्ण बिंदु, जब समाज के विभिन्न सदस्य आपनी-अपनी आर्थिक सिद्धियों का आनंद मनाते हैं। इसलिए उत्सव के सभी नियम इस पर लागू होते हैं। उत्सव का एक प्रमुख नियम यह है कि आर्थिक हैसियत ही उसमें हमारी भागीदारी तय करता है। जिसके पास जितने अधिक साधन या संसाधन होते हैं, उनके अनुसार ही वह अपने दिल के गुबार निकालता है। जब तक भारतीय जीवन में लक्ष्मी का सिक्का इतनी जोर से नहीं उछला था, तब तक दीपावली में भी एक सादगी थी। उत्सव मनाने के तौर-तरीकों में ऊपर-नीचे के स्तर ज्यादा नहीं थे। इसलिए दीपावली जोड़ती ज्यादा थी, तोड़ती नहीं के बराबर थी।

अब न वह आसमान रहा, न वे पंछी रहे। भारतीय समाज में धन की उपासना कुछ इस तरह चल रही है कि वह समाज को बहुत ज्यादा बांटने और तोड़नेवाला तत्व हो गया है। दीपावली पर इसका असर यह पड़ा कि वह तड़क-भड़क और लेन-देन के गोरखधंधे का शिकार हो गई। जिसके पास जितना पैसा, वह दीपावली का उतना ही बड़ा उपासक। सरस्वती का गुण यह है कि वह बोलती ज्यादा है, कहती कम है। उसका मूल स्वभाव संयम और विनम्रता का है। जबकि लक्ष्मी हमेशा बड़बोली रही है। आजकल तो वह अपने असली वक्त से भी ज्यादा बोलती है, क्योंकि समाज जिधर जा रहा है, उसमें सार के बजाय बिंब या छवि का महत्व बहुत ज्यादा हो गया है।

जब मौजूदा आर्थिक संकट अमेरिका से होते हुए भारत तथा दूसरे देशों में फैला, तब पहली बार यह भेद खुला कि सार और छवि में कितना भारी गैप हो सकता है। जिन्हें हम इस्पात की मजबूत मूर्ति मानते हैं, उनके भीतर भूसा भरा हुआ था। राजनीतिक क्षेत्र में यथार्थ के इस आकलन का प्रतिफलन यह है कि कौन नेता कैसा है, इसकी बात नहीं की जाती है, चर्चा यह होती है कि किस नेता की छवि कैसी है। दीपावली के अवसर पर छवि निर्माण  की दंड-बैठक बहुत गंभीरता से की जाती है। बड़े लोगों के लिए यह खेल होता है, गरीब और कम गरीब इसमें मारे जाते हैं। फिर भी, जैसा कि मानव स्वभाव है, सभी भरसक पूरी कोशिश करते हैं कि उनके चेहरे पर पर्याप्त रंगीनी दिखाई पड़े। इसका लाभ उद्योग-व्यापार को मिलता है, यानी जितना मिल सकता है, क्योंकि हमारी आर्थव्यवस्था इस पाए की तो है नहीं जिसमें देश के नब्बे-बानवे प्रतिशत लोग भी खुशी-खुशी शरीक हों।

अगर किसी अंतरिक्ष यान से हम धरती के प्रभाव मंडल से बाहर जा कर दीपावली के दिन भारत पर फोकस करें, तो हम पाएंगे कि कुछ बिन्दुओं पर खूब तेज रोशनी हो रही है। वहां खूब पटाखे चल रहे हैं। फुलझड़ियों की बहार है। मकान रोशनी से नहाए हुए हैं। ये हमारे सात-आठ महानगर हैं। उनके बाद बहुत से टिमटिमाते हुए बिंदु नजर आएंगे, जहां प्रकाश से अधिक प्रकाश के छोटे-मोटे आभास होंगे और होंगी बीच-बीच में चमक उठती चिनगारियां।

आपका अनुमान सही है- ये देश के असंख्य छोटे-छोटे शहर और कस्बे हैं। यही भारतीय स्थापत्य का मध्यवर्ग है। और अंत में प्रार्थना की तरह, लगभग दो-तिहाई भारत तिमिर-ग्रस्त दिखाई देगा- अमावस्या की रात में और ज्यादा बेनिशान, बेहैसियत तथा एक-दूसरे से अभिन्न। यह ग्रामीण भारत है और यही उसकी दीपावली है। अगर आपकी आंखों में आंसू बचे हुए हैं, तो आप इस अंधकार प्रदेश पर उन्हें बड़े शौक से बहा सकते हैं।

दीपावली के अवसर पर यह सब कहने-सुनने का कोई फायदा नहीं है। खासतौर से पर्व-त्यौहारों पर जिंदगी ऐसे ही चलती है। इस पर रोना-पीटना बेकार है कि एक रात में इतने करोड़ या अरब रुपए पटाखों-फुलझड़ियों में नष्ट हो गए या इतना ज्यादा प्रदूषण फैल गया। प्रेम की तरह त्योहार के वक्त भी आदमी अंधा हो जाता है। उस समय किसी को अपने दिल का गुबार निकालने से रोका जाता है, तो वह इसे अपनी स्वायत्तता पर हमला मानता है। वैसे भी, हर उत्सव में थोड़ी-बहुत बर्बादी होती ही है। शायद उत्सव की अवधारणा में ही यह निहित है कि बर्बादी करने की क्षमता कितनी है। जितना बड़ा उत्सव, उतनी ज्यादा बर्बादी। इसलिए दीपावली के स्वरूप का विकास जिस दिशा में हो रहा है, उसे रोक पाना असंभव है। समाज में जैसे दीपक होंगे, वैसी ही उनकी दीपावली होगी।

अगर कोई मुझसे पूछे कि दीपावली के दिन तुम्हारे मन में आजकल कौन सी बात ज्यादा छायी रहती है, तो मैं कहूंगा, चीन। अरुणाचल प्रदेश या नगालैंड वगैरह के मामले में चीन का दृष्टिकोण मुङो ज्यादा नहीं सताता। यह तो चीन का राजनय है, जो साल में दो-चार बार इस तरह के प्रेम-पत्र भारत को भेज देना जरूरी समझता है। चीन की असली चुनौती यह है कि वस्तुओं के बाजार में वह हमें हमारी ही जमीन पर पीट रहा है। त्योहार हम मनाते हैं, कमाता वह है। हमारी राखी उसके लिए धागों का त्योहार बन जाती है।

हमारी दीपावली पर उसके बल्ब जलते हैं और उसके पटाखे बजते हैं। यह रोशनी और यह शोर दिन-प्रतिदिन असह्य होते जाते हैं। अगर चीन से आए सामान के बदले में हमारे उद्योगपति और व्यापारी भी उसे उतना ही भेजते होते, तब भी गनीमत थी। फिलहाल तो इकतरफा प्रवाह ही बढ़ता जाता है और हमारी लक्ष्मी पूजा को विकलांग कर रहा है। इसके बारे में बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि सोचा नहीं जाएगा क्योंकि संपन्नता का कोई राष्ट्रीय शास्त्र हम बनाना नहीं चाहते।

विद्वानों की मेहरबानी से दीपावली के मौके पर यह जो रोशनी बनाम अंधेरा, सत्य बनाम असत्य और राम बनाम रावण का फालतू का प्रतीकशास्त्र खड़ा हो गया है, वह हमारे सांस्कृतिक पाखंड का सबसे बड़ा स्तूप है। जो समाज साल में सिर्फ एक दिन रोशनी बनाम अधेरे के द्वंद्व में पड़ता है, वह न अंधेरे के चरित्र को पहचान सकता है और न ही रोशनी के चरित्र को। इसलिए बेहतर है कि ध्यान रख सकते हैं कि तो इतना रखिए कि आपके दीपक में कम से कम अंधेरा लिपटा हो।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

raajkishore @gmail. com

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