DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तमिलनाडु : अंडों से निकलते नए राज

इस साल दशहरा-दीपावली का मौसम भारत ही नहीं पूरी दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय के लिए उत्सव का अवसर है। जिस चीज ने इस मौसम को वैज्ञानिकों के लिए विशेष बनाया है, वह है तमिलनाडु में डायनासॉरों के जीवाश्म बन चुके अंडे। असल में जूरेसिक पार्क की खोज अचानक ही हुई। भूगर्भ विज्ञानी और शोधकर्ता भारत और जर्मनी की संस्थाओं की तरफ से प्रायोजित एक परियोजना के तहत कावेरी की घाटी में चट्टानों और तहों का अध्ययन करने गए थे।

यह दल जब सेंदुराई गांव के चरागाह में बहती एक धारा के पास रुके तो उन्होंने बालू की तहों के भीतर से घड़े के आकार का एक जीवाश्म झांकते हुए देखा। इससे पहले हुई खोज में जो जीवाश्म मिला था, उससे लगा था कि वह डायनासार उस इलाके में कभी विचरण करता था। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि इस इलाके में डायनासॉरों के सैकड़ों अंडों वाले सैकड़ों घोंसले मिलें हों। यह इलाका चेन्नई और तिरुचि राजमार्ग के बीच में स्थित है।

माना जाता रहा है कि कावेरी नदी के उत्तरी मैदान में अरियालुर और पास में ही स्थित पेरंबलुर भूविज्ञानी क्षेत्र वास्तव में प्राचीन जीवों के अजायबघर हैं। इनका कार्यकाल 14 करोड़ वर्ष पहले का बताया जाता है और डेढ़ सौ सालों से ज्यादा समय से पूरी दुनिया के भूविज्ञानियों को आकर्षित करते रहे हैं।

इस खोज से बना उत्साह उस समय दोगुना हो गया, जब तमिलनाडु के पुडियारटूरियल शोध केंद्र और जर्मनी के इंटरनेशनल डायनासॉर शोध केंद्र ने इस बात की पुष्टि की कि भारत में अब तक जितने भी घोसले मिले हैं, उनमें यह सबसे ज्यादा अंडों वाला घोसला है। इस तथ्य ने अनुसंधान दल को हैरत में डाल दिया, क्योंकि उसी इलाके के करीब स्थित मध्य प्रदेश के जबलपुर को देश में डायनासॅार का सबसे समद्ध क्षेत्र माना जाता है।

इन अंडों का व्यास 13 से 20 सेंटीमीटर था और यह 1.25 मीटर चौड़े बालू के घोंसले में पाए गए। यह कुंभाकार अंडे एक घोसले में सात से आठ की संख्या में थे और क्रम करीब दो वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था। चूंकि यह अंडे राख की एक परत से ढके हुए थे इससे पता चलता है कि ज्वालामुखी फटने के कारण डायनासॉर विलुप्त हो गए। कई परतों में रखे गए इन अनिषेचित अंडों से यही पता चलता है कि डायनासॉर उस जगह पर अंडे इकट्ठा करने आया करते थे।

हालांकि वैज्ञानिक समुदाय इन खोजों के बारे में किसी पक्के नतीजे पर पहुंचे उससे पहले और भी अध्ययन किया जाना है, लेकिन शोधकर्ताओं में इस बात पर आम सहमति है कि यह अंडे इस धरती पर विचरण करने वाले सबसे पड़े डायनासॉरों में से किसी एक का है। धरती पर डायनासॉरों का कार्यकाल 16.5 करोड़ साल पहले बताया जाता है। वैज्ञानिक पहले ही इसे जूरेसिक युग चमत्कारी खजाना बता रहे हैं।

उन्हें यकीन है कि इससे डायनासॉरों के विलुप्त होने के कारणों पर और रोशनी पड़ेगी। जो पहचान की गई है, उसके अनुसार ये अंडे कारनोसॉर और सायरोपॉड प्रजाति के हैं। इससे यह पता चलता है कि यह विशाल सरीसृप इस इलाके में लगातार नहीं रहता था, लेकिन जब उसके अंडा देने का मौसम आता था तो वह यहां आता था। दिलचस्प बात यह है कि इन प्रजातियों में कारनोसॉर सबसे आक्रामक और सॉरोपाड सबसे ज्यादा विनम्र माने जाते हैं।

इसमें पहली प्रजाति हिंसक और मांसाहारी और दूसरी महज घास-फूस खा कर विशाल आकार और लंबाई प्राप्त करने वाली थी। बड़ी संख्या में अंडों के मिलने से डायनासॉरों के बारे में ताजा शोध बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन दो साल पहले मध्य प्रदेश के धार जिले में एक ही घोंसले में सबसे ज्यादा अंडे मिलने का भी रिकार्ड बन चुका है। हथिनी नदी के तट पर जीवाश्म बन चुके 12 अंडों का एक घोसला मिला है।

ये अंडे अपने वास्तविक रूप में इतने मजबूत थे कि कोई हिंसक पशु उन्हें आसानी से नष्ट नहीं कर सकता था, लेकिन दूसरी तरफ वे भीतर से इतने मुलायम थे कि बाल डायनासॉर जन्म के समय उन्हें तोड़ कर निकल सकता था। क्रिटेशियस युग के जीवों पर शोध का काम उन्नीसवीं सदी के आरंभ में तब शुरू हुआ था जब डायनासॉर के अडों की खोल सबसे पहले फ्रांस में मिली थी। तबसे दुनिया भर के 200 स्थलों पर हजारों अंडों के जीवाश्म मिले।

भारत में डायनासॉर के अंडों की पहली खोज 1843 में तब मानी जाती है, जब एक अंग्रेज दंपत्ति को ऐरालुर क्षेत्र में कई विचित्र किस्म की पत्थर की चीजें मिलीं। तब से इस इलाके में बहुत सारे जीवाश्म मिल रहे हैं और उनसे कई सिद्धांत भी खड़े हो रहे हैं।
 
radhaviswanath 73@ yahoo. com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:तमिलनाडु : अंडों से निकलते नए राज