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लक्ष्मी का वाहन

दिवान्ध, निशाचर जैसे नकारात्मक नामों से पुकारा जाने वाला उल्लू कैसे धनधान्य की देवी लक्ष्मी का वाहन बन गया, हैरान करने वाली बात है। खंडहरों, कब्रों या श्मशानों में निवास करने वाले इस पक्षी को अशुभ मानना स्वाभाविक था। उसका घर की दीवार पर बैठना अशुभ, बोलना अशुभ, सब कुछ अशुभ-अशुभ। संस्कृत के कवियों ने इसे अपशकुन का सूचक मान कर ही वर्णन किए हैं। भारत में ही नहीं अन्यत्र भी इसे अशुभ माना है। फारसी साहित्य में भी वह उजाड़ सुनसान खंडहरों में रहने वाला वर्णित है। दिन में देख नहीं सकता इसलिए दिवान्ध। रात्रि में विचरण करता है अत: निशाचर। इतना ही नहीं भारतीय परंपरा में तो मूर्खता का प्रतीक भी रहा है यह पक्षी।

सच तो यही है कि लक्ष्मी वाहन के रूप में गृहीत यह पक्षी न अशुभ, न मूर्खता के प्रतीक हैं। अशुभ भला शुभालक्ष्मी को कैसे वहन करेगा? मूर्ख भला कैसे लक्ष्मी की साधना कर सकेगा? और लक्ष्मीपति का सरस्वती से द्वेष की बात भी सही नहीं। विष्णु क्या बिना बुद्धि के सृष्टि पाल सकते हैं। ‘उलूक’ तो ज्ञान का, बुद्धिमत्ता का ही प्रतीक है, तभी एक प्रतिष्ठितम प्रकाशन संस्थान का परिचय चिह्न् है। गीता की बात करें तो वहां जो रात में जागृत रहता है, वह तो मुनि होता है।

यह जागरण आत्मजागृति या आत्मसंयम है। उल्लू के लक्ष्मी वाहन होने का अर्थ गहन है, जिसमें दर्शनिकता का पुट है। जो वासनाओं का दमन करते हैं, प्रलोभन से बचते हैं- नैतिक रूप से जागरूक रहते हैं, वही लक्ष्मी की साधना कर पाते हैं। वे ही दुर्भाग्य के अभिशाप से स्वयं को बचाते रहते हैं। धन-सम्पन्नता कभी भी भोगवाद का समर्थन नहीं करती, अपितु जनकल्याण का आश्रय लेकर त्यागवाद का आदर्श देती है। आत्मसंयम का भाव लक्ष्मी के आसन कमल से भी व्यक्त होता है, जो जल में रहकर भी जल से विलग, पंक में रहकर भी पंक से विमुक्त रहता है।

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