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नाक का सवाल

मानवीय अंगों में नाक ही बेहद संवेदनशील है। इसका कार्य क्षेत्र सूंघने से लेकर इज्जत के सवाल तक विस्तृत है। नाक कटवाने के लिए सूर्पनखा को महल से निकल कर जाना पड़ा था, लक्ष्मण के पास। अगर शर्मी-बेशर्मी से कुछ मतलब न हो तो नाक कटने या न कटने का कोई लाभ-नुकसान नहीं होता। राजनीति में नाक फुला कर बैठना असंतुष्ट दिखने की भंगिमा है। जो लोग नाक की सीध पर चलते हैं और लाल बत्ती पर नहीं रुकते, उनका चालान बड़ी मजबूरी में किया जाता है।

आप दिल्ली, लखनऊ आदि की ऐतिहासिक मलिन बस्तियों से गुजर रहे हों और आपके पास रूमाल न हो तो नाक की इज्जत चली जाती है। ऐसी बेसहारा नाक भला कब तक अनुलोम-विलोम करती रह सकती है। सड़ांध के अपने तेवर होते हैं। नाक पर हमला सीधे मान-मर्यादा पर हमला माना जाता है। कटी नाक कभी-कभी उस राजनैतिक दल जैसी हो जाती है, जो कटी नाक पर हाथ रखे- ‘जै जै जिन्ना, जै श्रीराम’ का भजन गा रहा हो।

नाक का सवाल कभी राजपूती शान और बहादुरों की आन का होता था। आज उसकी उपयोगिता इतनी है कि अगर नाक न हो तो आंख का चश्मा टिक नहीं पाता। नाक न हो तो जुकाम कहां होगा। छींक कहा से आएगी। बहती नाक का भी अपना एक सौंदर्य है। उसका क्या होगा। नाक के निधन के बाद रूमाल तो विधुर ही कहलाएगा। जब तक नाक है, तब तक रूमाल की साख है। आपका कद भले ही ढाई फुट का हो मगर नाक तो ऊंची रहनी ही चाहिए।

जिसके पास बचा-खुचा स्वाभिमान है, उनका दायित्व है कि राष्ट्र के लिए प्राणायाम करते वक्त नाक पर मक्खी न बैठने दे, अन्यथा ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाएगा। यूं अगर नाक पर गंदगी या गुड़ न लगा हो तो आजकल पढ़ी-लिखी मक्खियां भी नहीं बैठती। कभी-कभी जिसकी नाक पर मक्खी बैठी हो वो आलसी राजा जैसा लगता है। और जो मक्खी मारने के प्रयास में राजा की नाक काट दे तो उसे प्रबुद्ध प्रजा का सम्मान मिलता है। इसलिए आलसी और विलासी राजा को चाहिए कि वो असली मक्खियों से न डरे। डरे तो मक्खी जैसे भिनभिनाते चमचों से।

मुझे समझ में नहीं आता कि सारी इज्जत, मान मर्यादा  और शर्मो-हया सिर्फ नाक पर ही क्यूं टिकी है। सुसरे हमारे दूसरे अंग फिर हैं किस काम के। आखिर उन निठल्लों की भी कुछ जिम्मेदारी होनी चाहिए। जिनके नाक नहीं होती, क्या वे जीते नहीं। नाक तोते की हो तो सराही जाती है। मगर ये जानकारी तोते को क्यूं नहीं है। नाक बचाने की चिंता सिर्फ मनुष्यों के भाग में है। मगर क्यूं? आक्छीं..।

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