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खामोश पहल

कश्मीर समस्या के विशेष समाधान के लिए सरकार ने संवाद की खामोश पहल कर दी है। सैयद अली शाह गिलानी जैसे विध्नसंतोषी नेताओं को छोड़ दिया जाए तो कश्मीर के ज्यादातर राजनीतिक संगठनों ने इसका स्वागत ही किया है। सर्वदलीय हुर्रियत कांफ्रेस के उदारवादी धड़े के नेता मीरवाइज उमर फारूक ने भी बातचीत से ही समस्या के समाधान पर जोर दिया है। लेकिन इस बातचीत का एजंडा क्या है इसका खुलासा सरकार नहीं करना चाहती। गृहमंत्री पी. सी. चिदंबरम ने साफ कर दिया है कि यह वार्ताएं मीडिया की नज़र से बच कर की जाएंगी।

गृहमंत्री और हुर्रियत नेताओं के बयानों से जो बात निकल रही है, वह है खुलेमन से समस्या को समझने का प्रयास। चिदंबरम ने कहा है कि हम बिना किसी पूर्वग्रह के यह पहल कर रहे हैं और इसी से उत्साहित होकर मीरवाइज फारूक की यह टिप्पणी भी अहमियत रखती है कि सरकार ने इस बार कश्मीर को अभिन्न अंग नहीं एक मुद्दा माना है। हो सकता है यहां सरकार और कश्मीर के अलगाववादी नेता दोनों अपने मन की भावनाएं व्यक्त कर रहे हों पर यह स्थिति हिंसा और संवादहीनता के मुकाबले तो बहुत अच्छी है।

कश्मीर में इस महीने के अंत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दौरा होने वाला है, जिस दौरान वे रेलवे और अन्य परियोजनाओं को अमली जामा पहनाएंगे। सरकार ने हाल में देश के एक बड़े नौकरशाह को कश्मीर में विशेष नियुक्ति देकर भेजा था तभी से यह अनुमान लगाया जा रहा था कि वहां कोई पहल होने वाली है। केंद्र सरकार ने कश्मीर के लिए दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों को भी मंजूरी दी है।  दूसरी तरफ सरकार ने कश्मीर और उत्तर पूर्व राज्यों में लंबे समय से चली आ रही सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम में भी संशोधन कर दिया है। हो सकता है यह स्थानीय मांगों के पूरी तरह अनुकूल नहीं हो, लेकिन इसमें उनकी भावनाओं का ध्यान रखा गया है।

आतंकवादी घटनाओं में आई कमी, बदलते मौसम में घटती घुसपैठ और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए यह पहल की गई है। एक तरफ अरब देशों ने कश्मीर समस्या के हल की मांग तेज की है तो दूसरी तरफ इसी महीने के अंत में लंदन में भी क श्मीर पर कई समूहों को शामिल करने वाला सम्मेलन होने जा रहा है। ऐसे समय में सरकार अपनी सदिच्छा और सहानुभूति से इस गुत्थी की कोई गांठ खोल भी सकती है।

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