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दीवाली पर आई नई जेनरेशन लाइट


दीवाली पर आई नई जेनरेशन लाइट

रोशनी का त्योहार सामने है और ग्लोबल वार्मिग भी लगातार हमें आगाह कर रही है, इसीलिए बार-बार बिजली के कम से कम इस्तेमाल पर जोर दिया जता है। पश्चिमी देश तो बिजली खपत में आगे हैं ही, भारत जसे विकासशील देशों में भी विस्तार की रफ्तार के चलते बिजली ज्यादा फुंकने लगी है। बिजली बचाने में सक्षम इलेक्ट्रिक उपकरणों की जरूरत तेज हुई है।

दुनियाभर में सी.एफ.एल. यानी कॉम्पेक्ट फ्लोरेसेंट लैम्प ने साधारण बल्बों को निगल लिया है। इस्तेमाल बढ़ाने के लिए छूट और प्रचार अभियान चलाए जते रहे हैं। अब तो सी.एफ.एल. की रुखसती के दिन भी नजदीक बताए जाते हैं, क्योंकि ज्यादा कारगर और यूजर फ्रेंडली लेड या कहें लाइट इमिटिंग डिमोड से रोशनी बिखेरने की तैयारी है।
हालांकि 1920 के दशक में लेड रोशनी का आविष्कार रूस में हुआ था, पर अरसे बाद 1962 में आंशिक तौर पर अमरीका ने इसे अपनाया। इसकी तकनीक बेहद महंगी होने की वजह से जन-जन तक नहीं पहुंच पाई। आज लेड ज्यादा व्यावहारिक और वाजिब हो गई है। फिलहाल हिन्दुस्तानी बाजर ने रोशन होने के लिए लेड का रुख कर लिया है। इसी साल लेड को घर-घर पहुंचाने के लिए फिलिप्स कंपनी ने पहल की है। इसकी पेशकश डेको-लेड, लेड कैंडल, लेड विटेलाइट, लेड फ्लेश लाइट और इमेजीओ यूजर फ्रैंडली हैं। नई जेनरेशन की लेड लाइट लम्बी उम्र, मौसम प्रूफ तथा न चटकने वाले प्लास्टिक बल्ब के साथ सुरक्षित है। यह विभिन्न आकार, प्रोग्राम और डिजिटल कंट्रोल में उपलब्ध है और अल्ट्रा वायलेट या इंफ्रा रेड रेडिएशन नहीं छोड़ती। कम वोल्टेज पर काम करती है और कम ही गर्माहट छोड़ती है। और फिर आबोहवा को साफ-सुथरा रखने की कीमत पर, डिजाइन या खूबसूरती से हरगिज समझोता नहीं करना पड़ेगा। फिलिप्स की खासमखास लाइटें 250 रुपए से 20,000 रुपए के बीच मिलती हैं।

ग्लेसियल लेक कम्पनी का ब्रांड ग्लेशियल लाइट टी8 ट्यूब लाया है, जो सी.एफ.एल. की जगह लेने के लिए आदर्श है। टी8 ट्यूबें प्रदूषण रहित आबोहवा को कायम करने में सहयोग देती हैं। इसी कम्पनी की ग्लेसियल लाइट बार टूटने के भय बगैर डिम या हल्की रोशन की जा सकती है। साथ-साथ सी.एफ.एल. ट्यूबों की भांति पतली बार से बराबर रोशनी निकलती है। टी8 ट्यूबें अलग-अलग मॉडलों और 30 से 120 सेंटीमीटर रेंज में मिलती हैं। सो, जहिर है कि यह पहली दीवाली है, जब घर-घर ग्रीन होने का विकल्प आपके हाथ में है। जहरीली कार्बन से छुटकारा पाने का मन करे तो लेड से घर-आंगन और आबोहवा रोशन कीजिए।

लेड है न!
लाइट इमिटिंग डिसोड यानी एलईडी उर्फ लेड इलेक्ट्रानिक लाइट सोर्स है, जिसका आविष्कार रेडिया टेक्निशियन ओलेग वेदिमिरोविच सोसेव ने किया था।
शुरू-शुरू में लेड लाइटें हल्की लालिमा भरी रोशनी देती थीं, लेकिन आज उपलब्ध मॉडर्न लेड अल्ट्रा वायलेट और इंफ्रा रेड वेव लैंथ्स खूब चमकती रोशनी उभारती हैं।
लेड सेमी-कंडक्टर डिमोड पर आधारित है। डिमोड को स्विच ऑन करते ही, इलेक्ट्रोन्स घुलमिल कर रोशनी की शक्ल में ऊर्जा को जन्म देते हैं।
लेड आम पारंपरिक लाइटों से कई मोर्चो पर बेहतर है। बिजली की कम खपत, लंबी उम्र, छोटा आकार, फटाफट ऑन-ऑफ और मजबूती चंद फायदे हैं। इन खूबियों के चलते लेड का इस्तेमाल कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में खूब
फैला है।

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