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दीवाली पर स्वाद अनेक

दीवाली पर स्वाद अनेक

दीवाली के दिन घर की साज-सज्जा ही सुंदर नहीं लगती, रसोई से आती तरह-तरह के पकवानों की महक भी सबको अपनी ओर खींचती है। पर उससे भी खास है दीवाली की पारंपरिक मिठाइयां, जो एक प्रदेश से बाहर निकलते ही दूसरे प्रदेश में अलग स्वाद ले लेती हैं। ड्राईफूट्र और चॉकलेट हैंपर्स की मांग भले ही बढ़ रही हो, पर मिठाई के बिना अभी भी दीवाली की कल्पना करना अधूरा-सा लगता है। दीवाली के मौके पर पारंपरिक मिठाई और पकवान बनाने और खिलाने का शौक अभी भी कम नहीं हुआ है। दीवाली के करीब आते ही घरों में मिठाई बनाने के लिए केसर, बादाम, पिस्ता, खोया, घी और दूध की मांग बढ़ने लगती है।

पारंपरिक तौर पर खील, बताशे और चीनी के खिलौनों का उपयोग तो लगभग हर जगह देखने को मिलता है, पर इससे अलग बनने वाले पकवानों की भी कमी नहीं है। कई हिंदू परिवारों में दीवाली से पहले व्रत रखने की परंपरा भी है, जिसमें व्रत दीवाली के दिन खुलता है। व्रती लोग गेहूं के आटे, चीनी और घी से बनी लपसी से व्रत खोलते हैं। यदि हम महाराष्ट्र की बात करें तो वहां शीरे यानी हलवे को प्रसाद के तौर पर इस्तेमाल किया जता है, जिसमें केसर, इलायची, किशमिश और मेवे भरपूर मात्रा में डाले जते हैं। गारमेंट का व्यवसाय करने वाली मीता बताती हैं, ‘मेरी ससुराल मथुरा में है। हमारे यहां दीवाली पर सुबह-सुबह हनुमान जी की पूजा होती है और चूरमे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। चूरमा घर पर ही बनाने का रिवाज है। मैं जब शादी होकर आई तो मेरी सासू मां चाहती थी कि मैं चूरमा घर पर बनाऊं। मेरी व्यस्तताएं अधिक थीं, इसलिए मैं चूरमा बाजार से मंगवाना चाहती थी। मेरे इस विचार को लेकर शुरुआत में मेरी सासू मां नाराज भी रहती थीं, पर समय के साथ बदलाव आया। कभी बाजार से मंगवा लेती हूं तो कभी घर में बनाती हूं, जिसे सभी चाव से खाते हैं। 

मॉडल टाउन में रहने वाली मेहा कहती हैं, ‘मेरा मायका और ससुराल दोनों हरियाणा में हैं। पूरी, कचौड़ी, तीन-चार सब्जी, खासतौर पर पनीर की सब्जी अभी भी बनाए जाते हैं, पर लक्ष्मीजी के पूजन के लिए हलवा या खीर में से कोई एक वस्तु होनी जरूरी होती है।’ महाराष्ट्र में पूरे परिवार के साथ पारंपरिक तरीके से दीवाली मनाने के तौर-तरीकों को याद करते हुए आशुतोष कहते हैं, ‘दीवाली का वह रंग अलग ही था। अधिकतर मिठाइयां और पकवान घर पर ही बनाए जते थे। दिल्ली और उत्तर प्रदेश में जहां गुजिया होली पर बनाने और खाने का चलन है, वहीं महाराष्ट्र में दीवाली के अवसर पर गुजिया, जिसे करंजी कहते हैं, अवश्य बनाई जाती है। इसी के साथ अनारसा , चकली, सेव, शक्करपारे और चिड़वा भी दीवाली पर बनाए जते हैं। महाराष्ट्र में छोटी दीवाली या नरक चतुर्दशी की रौनक भी देखने लायक होती है। पहले नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले ही तेल और उबटन के साथ स्नान किया जता था। उसके बाद पूजा होती थी। दीवाली की मिठाइयों को खाने का सिलसिला उसके बाद ही शुरू होता था।’


कानपुर में रहने वाली अर्चना के अनुसार, ‘हमारे यहां दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश को भोग घर की बनी मिठाइयों से ही लगाया जाता है। भोग के लिए आटे और बेसन के लड्डू और बालूशाही अवश्य बनते हैं।’ इसके अलावा उत्तर प्रदेश में दीवाली पर तहरी और जिमीकंद की सब्जी व पकौड़े बनाने का भी चलन है। बिहार में हालांकि छठ पूज का महžव अधिक है, लेकिन दीवाली की रौनक भी कुछ नहीं। बेसन के लड्डू, गुड़ की चाशनी में बने मुरमरे के लड्ड और शक्करपारे दीवाली पर घरों में बनते हैं। पूज के समय मखाने चढ़ाने का चलन भी है। दिल्ली की तरह मिठाइयां बांटने का चलन हालांकि वहां कम है। स्थान की मजबूरियां आगे बढ़ने से रोक रही हैं, पर हर प्रांत के दिल्ली के स्वाद निराले हैं।

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