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काम के बाद निकाले जाने वाले मामलों की जांच शुरू

नगर निगम में काम करवाने के बाद टेंडर निकालने की प्रथा अब खत्म हो जाएगी। नगर निगमायुक्त सीआर राणा ने इसको गलत करार दिया है। अब से पहले हुए ऐसे कार्यों की जांच बैठा दी है। निगम सचिव प्रताप सिंह को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। सचिव ने इंजीनियरिंग शाखा के अफसरों को नोटिस भेजकर कुछ कार्यों पर रिपोर्ट तलब की है। हिन्दुस्तान ने अपने 26 जून 2009 के अंक में ‘काम के बाद निकाला जाता है टेंडर’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। इसमें विकास कार्य करवाने में बरती जा रही लापरवाही को उजागर किया गया था।


हिन्दुस्तान में प्रकाशित खबर की कटिंग मंत्री एसी चौधरी व निगमायुक्त सीआर राणा को सौंपते हुए मानव सेवा समिति ने कार्यों में बरती जा रही ऐसी लापरवाही को खत्म करने की मांग की थी। पार्षद सीमा त्रिखा व समाजसेवी विष्णु ने भी निगमायुक्त को पत्र लिखकर ऐसे कार्यों पर अंकुश लगाने की मांग की। एनआईटी-तीन में हुए विकास कार्य का सबूत भी विष्णु ने पेश किया। खबर के बाद अनियमितताओं को दूर करने के लिए समाज में आवाज बुलंद हुई, जिसको गंभीरता से लेते हुए निगमायुक्त ने टेंडर से पहले हुए कार्यों की जांच बैठा दी। जांच अधिकारी ने शिकायतकर्ता व इंजीनियरिंग शाखा के अफसरों को रिकॉर्ड सहित बुधवार को सुनवाई के लिए बुलवाया था, किसी कारणवश सुनवाई टल गई। जांच अधिकारी का कहना है कि मामले की जांच शुरू कर दी है। लापरवाह कर्मचारी व अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


दरअसल, निगम बजट का अधिकांश हिस्सा सिविल वर्क पर ही खर्च होता है। पिछले वित्त वर्ष में साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए ऑरिजनल वर्क का बजट रखा गया, जो कुल बजट का सत्तर फीसदी से ज्यादा हिस्सा था। इसमें सड़क, नाले, भवन आदि पर ज्यादा खर्च किया गया। कई कार्य टेंडर जारी करने से पहले ही अफसरों ने नियमों को दरकिनार करते हुए करवा दिए।

निगम में टेंडर के खेल की बानगी
-एनएच-2 व एनएच-3 का कार्य नौ लाख 36 हजार रुपये में बिना टेंडर के करवा दिया।
-एनएच-3 में सात महीने पहले गलियों में इंटरलॉकिंग का कार्य कर दिया।
-एनएच-3 में ही 31 मार्च 2008 को स्ट्रीट लाइट के टेंडर का वर्क ऑर्डर हुआ। इसी दिन दो लाख 29 हजार रुपये का  भुगतान किया गया, जबकि यह काम 10 अप्रैल 2008 को शुरू करना था।
-रोज गार्डन में पांच लाख 99 हजार रुपये की लागत से फुटपाथ बनाना था। 28 जनवरी 2009 को वर्क आर्डर हुए। पांच फरवरी 2009 से काम शुरू करना था। तीन फरवरी को ही 34 हजार रुपये का भुगतान कर दिया गया।

क्या कहते हैं नियम
-50 हजार रुपये से ज्यादा लागत वाले कार्यों के लगाए जाते हैं टेंडर
-50 हजार रुपये से कम लागत वाले कार्यों को क्यूटेशन पर करवाया जाता है
-तीन महीने में टेंडर प्रक्रिया पूरी होती है
-काम शुरू होने के बाद पेमेंट लेने के लिए ठेकेदार को बिल देने होते हैं
-90 दिन में टेंडर का जवाब निगम प्रशासन को देना होता है
-रेट सही न होने पर रद्द करके निगम दोबारा टेंडर लगा सकता है
-टेंडर फाइनल होने के बाद वर्क आर्डर दिया जाता है
-वर्क आर्डर वाले दिन पेमेंट का नियम नहीं
-निर्माण शुरू होने से पहले उस जगह की मिट्टी की जांच करनी अनिवार्य
-गुणवत्ता परखने के लिए निगम की सिविल इंजीनियरिंग विंग के अफसर सामग्री के नमूने भरते हैं
-जांच के लिए नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं, ताकि ठेकेदार घटिया सामग्री का इस्तेमाल न कर सके

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  • Web Title:काम के बाद निकाले जाने वाले मामलों की जांच शुरू