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अंधकार से युद्ध करना है

दीपावली भारतीय अस्मिता और जातीय-स्मृति का विजय पर्व है। इस पर्व में लोक चेतना, लोक संस्कृति का लोक स्वर प्रधान है। दीपावली को लेकर अकेले राम के साथ इतने मिथक, आख्यान, प्रसंग-प्रकरण, लोक विश्वास, लोक गाथाएं एवं लोक हृदय में बसने वाले लोकगीत हैं कि वे हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता की स्मृति के पर्याय हैं। दीपावली के मिथकों की सौंदर्य शक्ति यह है कि वे न कभी अतीत होती हैं, न व्यतीत होते हैं- वे तो निरंतर वर्तमान हैं।

उनकी वर्तमानता, निरंतरता ही भारतीय चिंतन के काल आयामों की चेतनता है। राम लोकनायक और लोक जीवन में वृत्त हैं और राम की विजयगाथा लोक का अपराजेय सामूहिक मन है। इस मन का संकल्प है अंधकार, अन्याय, रावणी-राक्षसी वृत्तियों का दमन और उन पर विजय। ताकि धरती की पुत्री सीता को धरती की पवित्र स्वाधीनता में पाया जा सके। इस अर्थ में दीपावली लोक मन की विजय यात्रा है।

दीपावली में आलोकित पर्व की ज्योतिर्मय देवी-माता महामाया विराट पुरुष के साथ सृजन का रहस्य खोल देती है। दीपावली में महालक्ष्मी, महामाया, त्रिपुर सुन्दरी, आद्या शक्ति प्रकृति की पूजा होती है। ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अनुसार सृष्टि की मूलभूत आद्या शक्ति महालक्ष्मी हैं इसमें सत्व, रज, तम तीनों गुणों का अभिन्न सामंजरूस है और इच्छा, क्रिया, ज्ञान की एकता के लिए तप-भाव। लक्ष्य-अलक्ष्य, सचराचर जगत देवी का स्वरूप है और समस्त जगत का उदभव-सृजन का वही मूल कोण है। उसी से विविध शक्तियों का आविर्भाव होता है।

इसलिए दीपावली के दिन दीपक जलाकर महालक्ष्मी का पूजन अपने अर्थ में एकवचन न होकर बहुवचन रूप में कालरात्रि के रूप में काल-पुरुष को जीतती हैं और जीवन की सजर्नात्मकता के रूप में गरीब-अमीर का भरण-पोषण करने के लिए ‘श्री’ अर्थात सम्पदा-शोभा के रूप में सभी घरों में आती हैं, ताकि मानुष को नए जीवन का प्रेरणार्थक अर्थ समझाया जा सके। अपने सात्विक रूप में दीपावली की श्री-मां महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्देवी, सरस्वती, असुर मर्दिनी, दुर्गा के रूप में अभिव्यक्ति पाती हैं।

हमारा ‘बहुदेववाद’ दीपावली की महालक्ष्मी में विलक्षण सौंदर्य लेकर प्रकट होता है। पश्चिम के विद्वानों को हमारा बहुदेववाद या ‘पालिथीज्म’ समझ ही नहीं आता है। स्वयं टाल्स्टाय जैसा बड़ा कथाकार और चिंतक हमारे बहुदेववाद को अंधविश्वासवाद का रूप मानता है। ग्रीक-रोमन बहुदेववाद और अफ्रीका आदि देशों में पाए जाने वाले बहुदेववाद से भारतीय बहुदेववाद भिन्न इस अर्थ में है कि हमारे यहां एक ही आधार शक्ति अनेक रूपों में अपने को अवतरित करती है और अवतारवाद-लीलावाद के धरातल पर मानव बन जाती है। रस में मानव की दिव्यता-पावनता का पूरा दर्शन भरा वेदान्त सक्रिय है।

वेदों का इन्द्र कैसे विष्णु बनता है और विष्णु कैसे राम-कृष्ण बनते हैं। रुद्र कैसे शिव हो जाते हैं। यह अपूर्व मिथक-गाथा पश्चिम को नसीब ही नहीं है। आदिदेव वरुण, यम, अग्नि, सूर्य, चन्द्र सबका स्वामी है और सभी देवताओं में देवियों में व्याप्त है। त्रेता के राम-सीता, द्वापर में कृष्ण-राधा में प्रवेश कर जाते हैं और हमारी सभ्यता संस्कृति में नए लाभ की दीपावली का प्रवेश हो जाता है। अद्भुत है यह प्रकृति पुरुष का अद्वैतवाद कि एक ही आदिदेव विभिन्न रूपों में सौंदर्य में कभी राम-रस बनता है, कभी कृष्ण-रस का रसायन।

दीपावली के पूजन का उपासक मन भक्ति रस के साथ कहता है कि जो देवता, अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी देवाधिदेव, देवनायक, विराट पुरुष महादेव को मैं प्रणाम करता हूं। कोई दो हजार वर्ष पहले शिल्प-कला-काव्य में प्रकृति लय से देवता की जो शक्ति प्रकट हुई उसने पूरे काव्य, कला, नाटय़ शास्त्र के चिन्तन को बदल दिया। शक्ति और शक्तिमान दोनों एक हो कर किसानों, कुम्हारों या सर्वसाधारण के कौशल में समा गए। सीता कृषि देवी बन गईं, हल से जोती रेखा के रूप में- जो शोषण के रावण को मरवाने के लिए जन्मीं। धरती पुत्री फिर समा गई धरती में और आज भी मौजूद है।

हमारे देवता काल को जीतते हैं- अलाभ-अभाव-अंधकार का नाश करते हैं। दीपावली की रात में घर-घर जाते हैं, ताकि लोक की सही जानकारी पा सकें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘आलोक-पर्व’ के एक लेख में दीपावली पर लिखा है कि ‘जिन लोगों ने संसार का भरण-पोषण करने वाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम ‘महालक्ष्मी’ स्वीकार किया है।

दीपावली का एक बड़ा ध्वन्यर्थ यह भी है कि हर तरह के अंधकार से युद्ध करके उसे जीतना है। यही मंत्र है- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले चलो। हमारा आराध्य देव गति को पसंद करता है, जड़ता को नहीं। यह विचार प्राप्त करने में हमारी परम्परा के संतों आचार्यो को न जाने कितना समय लगा।

इसी भाव-भूमि पर आकर गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंधकार को हटाने के लिए भारतीय जनता में पर्व उत्सव के नाम पर नयी जागृति लाने के लिए नवजीवन में लेख लिखा- ‘दीवाली कैसे मनावें?’ गांधी जी ने कहा कि दीवाली मनाने का अर्थ है कि लूट तंत्र के रावण से भारत की सीता को मुक्त करें-राम से रामराज्य लाने की कल्पना करें और राम का मुकुट न भीगने दें- सीता के सुहाग पर दाग न आने दें, लक्ष्मण का कमरबंध ढीला न होने दें, भरत का भ्रातृभाव कम न करें, शत्रुघ्न की शत्रुविनाशक ताकत पर भरोसा करें और भारतीय जनता के अपराजेय हनुमानभाव को धारण करें। भारत के लोग पतित तथा कायर न बनें- यही दीपावली का संदेश है।’

गांधी के इसी लेख के प्रेरणा लेकर राममनोहर लोहिया ने चित्रकूट में रामायण-मेला के आयोजन की नींव डाली। रामचरितमानस में अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की शक्ति है। आज देश में उपभोक्तावादी संस्कृति का देहवादी अंधकार बलवान है- दीपावली पर्व पर हम उस अंधकार से जूझने का संकल्प लें।

यह देश राम की स्मृतियों से बना है और राम कहानी नहीं हैं- अतीत स्मृति नहीं हैं, साक्षात्कार हैं राम स्मृति बन जाएं यह सोच का विषय होगा, क्योंकि वे तो निरंतर हमारे भीतर बसे हैं जीवन्तता से धड़क रहे हैं। हमारे राम को इस देश के राजनीतिज्ञों ने कलंकित किया, लेकिन हमारी जनता ने प्रवासी भारतीय बनने पर भी कभी भी अपने हृदय से नहीं निकाला है। दीपावली का पर्व दीनता, दरिद्रता, शोषण को मिटाने का संकल्प पर्व है, जिसमें पूरी भारतीय संस्कृति-परंपरा सीता तप के साथ मौजूद है। जो लोग बाजार व्यवस्था में इस देश को फिर से पश्चिम का ‘उपनिवेश’ बनाने को आमादा हैं, उनसे जूझना है ताकि हमारी स्वाधीनता अक्षत रह सके।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं

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