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धनतेरस

मनुष्य दो ही चीजों की विशेष कामना करता है धन और स्वास्थ्य। धन, विद्या और निर्मल काया के लिए निर्धारित देवी-देवता भी हैं। इन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए वर्ष में अलग-अलग तिथियाँ निर्धारित हैं। परंतु कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन और आयु दोनों के लिए दो देवताओं की पूजा-अर्चना का विधान है।

मान्यता है कि देव और दानवों द्वारा समुद्र मंथन करते हुए बहुत सी अनमोल वस्तुएं निकली थीं। उनमें अमृत कलश हाथ में लिए भगवान धनवन्तरि निकले थे। वे धन और स्वास्थ्य के भी देव माने गए। अमृतपान करने से मनुष्य मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। दीर्घायु होता है। हमारी मान्यता भी है कि ‘स्वास्थ्य ही धन है।’ भगवान धनवन्तरि दोनों प्रकार के धन हमें प्रदान करते हैं।

दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है। परंतु उसके दो दिन पूर्व से ही बाजारों में दीप मालाएं सजने लगती हैं। भगवान धनवन्तरि के हाथ में कलश था, इसलिए बर्तनों की दूकानों में धनवन्तरि की पूजा की परंपरा रही है। सब कोई एक बर्तन अवश्य खरीदते रहे हैं। यूँ तो शास्त्रों में चाँदी खरीदना शुभ बताया गया है। परंतु अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार लोग तांबा या पीतल ही खरीदते रहे हैं।

इसी तिथि को यम के नाम से भी घर के पिछवाड़े दक्षिण दिशा में दीप जलाने की परंपरा रही है। एक लोककथा के अनुसार राजा हेम के इकलौते पुत्र की आयु क्षीण थी। यमराज के दूत उसकी प्राण लेने आए। उसकी नवविवाहिता पत्नी के करूण विलाप ने पहली बार किसी यमदूत का हृदय पिघला दिया। तब यमराज ने बताया- कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रियोदशी को मनुष्य मेरे नाम से दीप दक्षिण की ओर रखता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।

मान्यताओं और पूजन व्यवहार के अनुसार धनतेरस ‘टू इन वन’ है। सेहत के लिए धनवन्तरि की पूजा और दीर्घायु होने के लिए यमराज को दीपदान। संपूर्ण समाज को आज के दिन की बधाई।

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