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बार-बार तकरार

भारत और चीन के बीच तकरार जिस तरह से बढ़ रही है, उसे देख कर अब यह नहीं कहा जा सकता कि यह मामला मीडिया के शरारती दिमाग की उपज है। यह बात अलग है कि ऐसे मौके पर मीडिया को ज्यादा वस्तुनिष्ठ और संतुलित होने की जरूरत है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से चीन के कड़े रुख ने दोनों देशों के सीमा विवाद को सतह पर ला दिया है।

हाल में अगर चीन ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा का चुनाव के मौके पर विरोध कर उस भूभाग के विवादित होने पर जोर दिया है। वहीं अरुणाचल की जनता ने 72 प्रतिशत से ज्यादा मतदान पर यह जता दिया है कि उसे चीन की तानाशाही के मुकाबले भारत का लोकतंत्र ज्यादा प्रिय है। आगामी महीनों में अरुणाचल प्रदेश में तिब्बती धार्मिक नेता दलाई लामा का दौरा भी प्रस्तावित है।

संभवत: चीन की परेशानी उससे भी बढ़ी है, लेकिन भारत को भी अब अहसास हो गया है कि अपने पड़ोसी देश चीन के आक्रामक रुख पर बहुत समय तक मौन रह कर अच्छे संबंधों की नींव नहीं डाली जा सकती । इसलिए भारत ने चीन के विस्तारवादी दावों का स्पष्ट विरोध करने का मन बना लिया है। इसी वजह से भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर में चीन की परियोजनाओं का सख्त विरोध करते हुए कहा है कि पीओके एक विवादित क्षेत्र है और भारत उस पर अपना हक जताता रहा है।
  
भारत के इस विरोध का इस मायने में भी राजनयिक महत्व है कि ठीक इसी वक्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी पेईचिंग की यात्रा पर हैं। स्पष्ट तौर पर वे भारत के खिलाफ राजनयिक पेशबंदी के लिए चीन को तैयार कर रहे होंगे और तभी भारत का यह पलटवार मौजूं कहा जा सकता है, लेकिन चीन के साथ तकरार का मामला यहीं खत्म नहीं होने वाला है। चीन ल्हासा से काठमांडू तक सड़क बनाने की तैयारी कर रहा है, जिस पर भारत को आपत्ति होनी ही है।

भारत और चीन की तकरार के मसले सिर्फ सीमा से ही नहीं जुड़े हैं। वे आर्थिक गतिविधियों से भी संबंधित हैं। शंघाई इलेक्ट्रिकल नाम की एक चीनी पावर कंपनी का आवेदन भारत में पिछले 18 महीनों से लंबित है। जाहिर है दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की जमीन अभी भी बहुत भरोसे की बन नहीं पा रही है, लेकिन वे किसी बड़े टकराव की तरफ बढ़े इससे पहले भारत को बिना झुके हुए अपना राजनयिक अभियान तेज कर बिगड़ती स्थिति को संभाल लेना चाहिए।

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