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भ्रष्टाचार का अंधेरा

भारतीय व्यवस्था की गिनती दुनिया की सबसे ज्यादा भ्रष्ट व्यवस्थाओं में की जाती है, यह तथ्य बार-बार सामने आता है। अभी जो नया मामला अमेरिका से सामने आया है, उससे भी हमारी छवि बहुत बेहतर नहीं बनती। कुछ अमेरिकी कंपनियों के अधिकारियों ने यह माना कि अंतरराष्ट्रीय ठेकों के बदले उन्होंने रिश्वत दी। रिश्वत लेने वालों में कई भारतीय सरकारी संगठनों के अधिकारी भी थे। वाशिंगटन में भारतीय उच्चयुक्त ने इस मामले में भारत सरकार को मई में चिट्ठी लिखी।

अब यह मामला मीडिया में आया तो सरकार कह रही है कि इसकी जांच हो रही है, जबकि अमेरिकी अधिकारियों को सजा भी सुना दी गई है। इससे हमारे देश के भ्रष्ट लोगों की तो हिम्मत बढ़ती ही है, साथ ही विदेशों में यह छवि मजबूत होती है कि भारत सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने में गंभीर नहीं है। पिछले दिनों सारी दुनिया में काले धन पर अंकुश लगाने का मामला गंभीरता से लिया जाने लगा है, क्योंकि काले धन से जुड़े कई खतरे नए सिरे से सामने आ रहे हैं।

पश्चिमी  देशों को यह समझ में आया कि नशीली दवाओं की तस्करी जैसे संगठित अपराधों से लेकर तो आतंकवाद तक के तार काले धन की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं और अपराध और अपराधियों के जो सुरक्षित ठिकाने हैं, उन पर आक्रमण करना जरूरी है। आर्थिक मंदी ने काले धन की खतरनाक भूमिका को फिर रेखांकित किया। जी-20 शिखर सम्मेलनों में यह मामला गंभीरता से सामने आया है। स्विट्जरलैंड इसी वजह से अपराधियों के लिए उतना सुरक्षित नहीं रहा।

अमेरिकी सरकार ने दबाव डालकर बैंकों से अमरिकी नागरिकों के खातों के बारे में जानकारी लेना शुरू कर दिया है। फिल्मकार पोलांस्की की ज्यूरिख में गिरफ्तारी भी यह बताती है कि दूसरे किस्म के अपराधियों के लिए भी स्विट्जरलैंड सुरक्षित नहीं है। अगर बाकी दुनिया भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों के प्रति गंभीर दिख रही है और हमारी गणना अफ्रीका की छोटी-मोटी तानाशाहियों के साथ होती है, तो यह अच्छी बात नहीं है और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है। भ्रष्टाचार के प्रति कड़ाई जहां हमारे आर्थिक विकास से जुड़ी हैं वहीं आतंकवाद और तस्करी जैसी समस्याओं से भी तभी हम निपट पाएंगे, जब आर्थिक अपराधों पर अंकुश लगाएंगे। एक खुली अर्थव्यवस्था का साफ-सुथरा होना भी जरूरी है और दुनिया के सामने ऐसा प्रकट भी होना चाहिए।

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