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गौ-संरक्षण के लिए कानून बने

हिन्दू धर्म में गाय को माता का दर्जा है लेकिन बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज गाय माता सड़कों पर लावारिस घूमती नजर आती है।  कृषि व अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में भी गाय का महत्वपूर्ण योगदान है। गाय के दूध, दही व घी में पौष्टिक आहारों की प्रचुरता होती है, जो इनका सेवन नित्य करता है वह बुद्धिमान होता है। साथ ही गाय का गोबर रेडियोधर्मी विकिरण तक को नष्ट करने में सक्षम है। हिन्दू धर्म में गाय को मोक्ष पाने का रास्ता माना जाता है, लेकिन बड़े दुख का पहलू है कि आज इसी हिन्दुस्तान में गौ हत्या बड़े निर्मम ढंग से की जा रही है। समय-समय पर साधु-संतों व बुद्धिजीवियों द्वारा गाय के अस्तित्व के लिए जनजागृति अभियान चलाये जाते हैं लेकिन ये अभियान तभी ज्यादा प्रभावशाली होंगे जब केन्द्र सरकार गौ हत्या को रोकने व गाय के संरक्षण के लिए कानून बनायेगी।
चन्द्रशेखर पैन्यूली, श्रीनगर गढ़वाल

कृषक-पशुपालक जाग्रत हों
एक समय था जब मानव समाज की आर्थिकी मात्र कृषि एवं पशुपालन पर टिकी थी। खान-पान की वस्तुओं के आदान-प्रदान से ही अन्य जरूरतों की पूर्ति होती थी। आधुनिक विकास एवं मौद्रिक प्रचलन ने कृषि सहित पशुपालन को भी प्रभावित करके उसे उपेक्षित सा बनाकर रख दिया है। उत्तराखंड भी इससे कैसे अछूता रह पाता। कृषि क्षेत्र में नकदी फसलों को बढ़ावा देकर दुधारू पशुओं के लिये पौष्टिक चारा व घास का प्रचलन बढ़े तो पहाड़ में अभी भी डेयरी उद्योग विकसित करने की पूरी गुंजाइश है। प्राय: देखा जा रहा है कि कृषक मोटे अनाजों के उत्पादन में जितना धन, समय, शक्ति बर्बाद करते हैं, उतना ही दुग्ध उत्पादन एवं नगदी फसलों में लगाये तो आर्थिकी में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है। एक समय था जब पहाड़ के हर कृषक के आंगन में बैलगाड़ी, दुधारू भैंसें, भेड़-बकरियां के रेवड़ हुआ करते थे , परन्तु आज यह सब बदल कर भैंस-बेल ट्रकों में लदकर सहारनपुर, मेरठ जा रहे हैं जिसके बदले में पहाड़ का पूरा पशुपालन चरमरा गया है। न बदले में भैंस आ रही है और न ही बैलों की जोड़ी। गौ-ग्राम यात्रा के आयोजकों को चाहिए कि पहाड़ से मैदान जा रहे बैलों-भैंसों की पूर्ति के लिये निकासी चौकियों पर यह बाध्यता सुनिश्चित करवाये कि जितनी गई उनके बदले अच्छी नस्ल की भैंस-गाय और बैलों की आपूर्ति भी हो। इसी में गौ-ग्राम यात्रा की सार्थकता होगी जिसके लिए स्थानीय कृषकों-पशुपालकों को भी जागृत होने की आवश्यकता है।
डॉ. गुलाब सिंह राणा, रुद्रप्रयाग

ओबामा को नोबेल जल्दबाजी
आठ माह के सीमित समय में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना जल्दबाजी है। इससे विश्व में अन्य सभी सामाजिक कार्यो और विश्व शांति के लिए वर्षो से काम करने वालों को गहरा आघात लगा है। ओबामा जो गांधी के प्रबल समर्थक हैं और उनके विचारों में विश्वास रखते हैं, उन गांधी जी को कभी नोबेल पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया। और भी कई ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने जीवनभर विश्व शांति के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उन्हें नोबेल तो दूर कोई छोटा पुरस्कार भी नहीं दिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति को उस समय यह पुरस्कार दिया गया है जब मुस्लिम देशों में उनकी आलोचना हो रही है।
प्रदीप सिंह, श्रीनगर गढ़वाल

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