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वार नहीं प्यार से मिलेगा नक्सलवाद से छुटकारा

वार नहीं प्यार से मिलेगा नक्सलवाद से छुटकारा

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नक्सलवाद की लानत से निजात पाना है तो बंदूक का डर कुछ हद तक तो इससे बचा सकता है, लेकिन समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए लोगों तक पहुंचना और उनकी भावनाओं को समझना जरूरी है।
    
ऐतिहासिक तथ्य इस बात का प्रमाण हैं कि माओवादियों के खिलाफ बड़े हमले बुरी तरह असफल रहे हैं। 20 राज्यों के 223 जिलों के 2,000 से अधिक थाना क्षेत्रों में वामपंथी उग्रवाद के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने वाले लोगों ने यह राय जाहिर की है। सरकार की नई द्विस्तरीय नक्सल विरोधी योजना भी इसी तर्ज पर काम कर रही है-नक्सलवाद का खात्मा और विकास को बढ़ावा।

केन्द्र की नयी नक्सल विरोधी नीति में एक तरफ तो करीब 40 हजार अर्द्धसैनिक बलों को शामिल किया गया है और दूसरी तरफ नक्सलवाद से निजात पाने वाले इलाकों में विकास गतिविधियों के लिए 7,300 करोड़ रूपए के पैकेज का प्रावधान है।

नई दिल्ली स्थित रक्षा अध्ययन एवं अनुसंधान संगठन के माओवाद विशेषज्ञ निहार नायक का कहना है, दूरदराज के इलाकों में उग्रवादियों को जनता का समर्थन हासिल होने के कारण सरकार द्वारा उनके खिलाफ चलाए जाने वाले ज्यादातर अभियान विफल हो जाते हैं। हालांकि आंध्र प्रदेश में 1970 के दशक के शुरू में और उसके बाद 2002-03 में दोबारा नक्सलवादियों के खिलाफ अभियान चलाए गए, लेकिन बाद में उग्रवादी फिर मजबूत हो गए।

दिल्ली स्थित विवाद प्रबंधन संस्थान के कार्यकारी निदेशक अजय साहनी का कहना है, यह सच है कि बल प्रयोग के बिना आप उग्रवाद को हरा नहीं सकते, लेकिन साथ ही आप को विकास पर भी ध्यान देना होगा, जो रातोंरात नहीं हो सकता ।

दिल्ली स्थित शांति एवं टकराव अध्ययन संस्था के निदेशक अनिमेष रौल का दावा है कि नक्सलवादियों को समाज और राजनीतिक प्रश्रय हासिल होने और सरकारी कार्रवाई में कमी के कारण नक्सलवादियों ने हिंसक गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

पिछले तीन वर्ष में उग्रवादियों ने 2,600 से अधिक लोगों को मार डाला। इनमें सबसे अधिक घटनाएं नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित चार राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में हुईं, जहां जनवरी 2006 से इस वर्ष अगस्त तक 2,212 लोगों की जान गई। रौल कहते हैं कि सरकार जब तक जनता तक पहुंचने के अपने प्रयासों में गंभीरता नहीं लाएगी, तब तक वह उनका समर्थन नहीं जीत पाएगी, जो उग्रवाद के खात्मे के लिए बहुत जरूरी है ।
    
साहनी के अनुसार 7,300 करोड़ रूपये की विकास योजना अच्छी है, लेकिन यह अपने उद्दश्यों के प्रति बहुत स्पष्ट नहीं है और योजना की सफलता अथवा असफलता जांचने के लिए यह होना आवश्यक है।

अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार ने कम से कम शुरूआत तो की। उड़ीसा में नक्सलवाद के विशेषज्ञ रजत काजरू के अनुसार, सरकार ने ग्रामीण भारत के आम आदमी तक पहुंचने की इच्छा जताई है, जहां उसका प्रतिनिधित्व बहुत कम है और राज्य सरकार की तरफ से भी कोई जवाब नहीं आता।
    
सुरक्षा मामलों की केन्द्रीय समिति द्वारा पारित एक प्रस्ताव के अनुसार सरकार की योजना है कि माओवादियों के लिए पनाहगाह बने जंगलात को साफ किया जाए और स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, थाने और सड़कें बनाकर क्षेत्र का विकास किया जाए।
   
केन्द्रीय गृह सचिव जीके पिल्लै ने पिछले सप्ताह कहा कि हमें उम्मीद है कि सुरक्षा बलों के संबद्ध इलाकों में पहुंचने और इलाके पर कब्जा जमाने के सिर्फ 30 दिन के भीतर हम वहां नागरिक प्रशासन बहाल करने में सक्षम होने चाहिएं ।

वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास संबंधी काम करना आसान नहीं होगा। उनके अनुसार इतने कम समय में घने जंगलों से माओवादियों को उखाड़ फेंकना आसान नहीं होगा। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ पुलिस कार्रवाई से नक्सलवादियों का खात्मा नाको चने चबाने के बराबर होगा।
    
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि हमने इस अवधि के दौरान देशभर में माओवादी हिंसा की 5,800 से अधिक घटनाएं देखीं, जिसकी वजह से सरकार को इस समस्या पर काबू पाने के लिए नयी नीति की घोषणा करनी पड़ी। कई राज्यों में नक्सलवाद चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहा है।

मौजूदा वर्ष में नक्सलवादी हिंसा में 760 लोगों की जान गई । इनमें महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में 17 पुलिसकर्मी मारे गए और छत्तीसगढ़ में अपृह्त एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी गई क्योंकि सरकार ने उसकी रिहाई के बदले में जेल में बंद माओवादी नेताओं को छोड़ने से इनकार कर दिया था। बागियों के खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियान के असफल रहने की एक और वजह उन्हें साजो सामान से पूरा समर्थन नहीं मिल पाना भी है ।
    
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवादियों के खिलाफ अभियान में सेना के इस्तेमाल से इनकार कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक अच्छा निर्णय है क्योंकि सेना तो बाहरी हमले से बचाव के लिए है आंतरिक सुरक्षा के लिए नहीं। इसके अलावा यदि सेना अपने ही देश के लोगों को मारना शुरू कर देगी तो सामाजिक अस्थिरता में बढ़ोतरी हो सकती है।

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