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नंदादेवी पीक

नंदादेवी पीक

नंदादेवी पीक हमारे देश की दूसरी सबसे ऊंची पीक है, जबकि विश्व में यह 23वें नम्बर पर है। उत्तराखंड राज्य में स्थित यह शिखर समुद्रतल से 7816 मीटर अर्थात् 25643 फुट की ऊंचाई पर है। नंदादेवी मैसिफ के दो छोर हैं। इनमें दूसरा छोर नंदादेवी ईस्ट कहलाता है। इन दोनों के मध्य दो किलोमीटर लम्बा रिज है। सोचो, कितने हिम्मत वाले होतें हैं वो पर्वतारोही, जो बर्फ से ढके इतने ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ते हैं। तुम्हें बताएं कि नंदादेवी पीक पर चढ़ना क्यों कठिन माना जाता है। दरअसल, इस हिमशिखर के मार्ग में आने वाले पहाड़ काफी तिरछे हैं। तुम समझ सकते हो, ज्यादा तिरछे पहाड़ों पर चढ़ते हुए बलिष्ठ व्यक्ति भी बहुत जल्दी थक जाते हैं, क्योंकि ऑक्सीजन की कमी के कारण खड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ना एक दुष्कर कार्य है। शायद यही कारण है कि इस शिखर पर जाने के इच्छुक पर्वतारोहियों को 1934 तक तो इस शिखर पर जाने का सही मार्ग नहीं मिल पाया था। इसका मार्ग ब्रिटिश अन्वेषकों द्वारा खोजा गया था। तब 1936 में ब्रिटिश-अमेरिकी अभियान को नंदादेवी शिखर तक पहुंचने में सफलता मिली। इनमें नोयल ऑडेल तथा बिल तिलमेन शिखर को छूने वाले पहले व्यक्ति थे, जबकि नंदादेवी ईस्ट पर पहली सफलता 1939 में पोलेंड की टीम को मिली। आश्चर्य की बात है कि नंदादेवी पर दूसरा सफल अभियान 30 वर्ष बाद 1964 में संभव हो सका। इस अभियान में एन. कुमार के नेतृत्व में भारतीय टीम शिखर तक पहुंचने में कामयाब हुई। इसके मार्ग में कई खतरनाक र्दे और ग्लेशियर आते हैं। नंदादेवी के दोनों शिखर एक ही अभियान में छूने का गौरव भारत-जापान के संयुक्त अभियान को 1976 में मिला था। 1980 में भारतीय सेना के जवानों का एक अभियान असफल रहा था। नंदादेवी तक पहुंचने में महिलाएं भला क्यों पीछे रहतीं। 1981 में पहली बार रेखा शर्मा, हर्षवंति बिष्ट तथा चंद्रप्रभा ऐतवाल ने यह साहसिक करिश्मा कर दिखाया।

पर्वतारोही बताते हैं कि नंदादेवी शिखर देखने में जितना भव्य नजर आता है, उतना सुंदर इसके आसपास का क्षेत्र है, क्योंकि यह पीक 21000 फुट से ऊंची कई चोटियों के मध्य स्थित है। यह पूरा क्षेत्र नंदादेवी नेशनल पार्क घोषित किया जा चुका है। इस नेशनल पार्क को 1988 में यूनेस्को द्वारा प्राकृतिक महत्व की विश्व विरासत का दज्र भी दिया जा चुका है। नंदादेवी के दोनों ओर ग्लेशियर यानी हिमनद हैं। इन हिमनदों की बर्फ पिघलकर एक नदी का रूप ले लेती है। पिंडारगंगा नाम की यह नदी आगे चलकर गंगा की सहायक नदी अलकनंदा में जा समाती है। जानते हो, उत्तराखंड के लोग नंदादेवी को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते है। यहां की लोककथाओं में नंदादेवी को हिमालय की पुत्री कहा जाता है। नंदादेवी शिखर के साये मे स्थित रूपकुंड तक प्रत्येक 12 वर्ष में कठिन नंदादेवी राजजात यात्रा श्राद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। नंदादेवी के दर्शन करने हों तो तुम औली, बिनसर या कौसानी जैसे पर्यटन स्थलों से कर सकते हो।अविनाश शर्माशेरपा तेनजिंग और एडमंड हिलेरी का नाम तो तुमने सुना ही होगा। इन दो पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट को सबसे पहले फतह करने के अलावा हिमालय पर्वतमाला की कुछ और चोटियों पर फतह प्राप्त की थी। एक साक्षात्कार के दौरान शेरपा तेनजिंग से पूछा गया कि उन्हें कौन सी चोटी पर चढ़ना सबसे कठिन लगा था तो उन्होंने कहा था, एवरेस्ट की तुलना में नंदादेवी शिखर पर चढ़ना ज्यादा कठिन है। आज हम तुम्हें उसी पीक के विषय में बताते हैं।

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