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पटाखे जलाओ, जरा संभलकर

पटाखे जलाओ, जरा संभलकर

दोस्तो, दशहरे पर रावण को जलाने के बाद अब तुमने दीवाली के लिए पटाखों की खरीदारी भी बड़े जोर-शोर से शुरू कर दी होगी। यूं तो तुम बच्चे हर त्योहार को बड़ी धूमधाम से मनाते हो, लेकिन दीवाली का त्योहार तुम्हारे लिए कुछ स्पेशल ही होता है। इस दिन तुम तरह-तरह के पटाखे फोड़ने में तल्लीन हो जाते हो, किंतु कभी-कभी ये पटाखे तुम्हारी आंखों के लिए खतरनाक भी साबित हो सकते हैं।

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव सूदन के अनुसार, दीवाली पटाखों का त्योहार है। इस दिन बच्चे भांति-भांति के पटाखे जला कर बड़े खुश होते हैं। कोई रॉकेट और फुलझड़ी जलाता है तो कोई चरखी। कई बच्चे तो हांडी फोड़ बम भी जलाते हैं। यही वह दिन है, जब बच्चों को सबसे ज्यादा आंखों में भी चोट लगती है, क्योंकि वे पटाखे जलाते समय कोई सावधानी नहीं बरतते। हर साल दुर्घटना के ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें बच्चे अपनी आंखों की रोशनी तक गंवा देते हैं। दरअसल पटाखे जलाते समय बच्चे कई प्रकार की गलती करते हैं। जो पटाखे नहीं जलते अर्थात फुस्स हो जाते हैं, वे उन्हें निष्क्रिय जान कर जाकर देखते हैं, जो कि कई बार अचानक फट भी जाते हैं। रॉकेट भी कई दफा दिशाहीन हो जाते हैं और आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं । शेखी दिखाने के चक्कर में कई बच्चे हाथों में लेकर पटाखे जलाते हैं। परिणामस्वरूप वे कई बार हाथों में ही फट जाते हैं। वास्तव में पटाखे चारकोल, एल्युमीनियम, सल्फर, डस्ट, मैग्नीशियम तथा पॉटेशियम नाइट्रेट से मिल कर बने होते हैं। ये आंखों के लिए बड़े ही घातक होते हैं।

डॉ. सूदन बताते हैं कि बच्चों को पटाखे हमेशा खुले स्थान पर ही जलाने चाहिए, ताकि दुर्घटना होने की संभावना कम रहे। जितना संभव हो हल्के-फुल्के पटाखे ही जलाने चाहिए, जैसे फिरकी, फुलझड़ी आदि। पटाखों से आंखों में खून जाना, पर्दा उखड़ना और कंजक्टाइवा फटने जैसी दिक्कत हो सकती हैं। इसके अलावा दस से बीस प्रतिशत मामलों में आंख की रोशनी भी चली जाती है, इसलिए पटाखे जलाते समय सेफ्टी गॉगल का इस्तेमाल करना अच्छा होता है। आंख से संबंधित कोई भी दुर्घटना होने पर आंख को कॉटन से ढक देना चाहिए। आंख को रगड़ना, दबाना और पानी से नहीं धोना चाहिए। ऐसी कोई भी समस्या उत्पन्न होने पर घरेलू उपचार न करके, तुरंत अपने नेत्र रोग चिकित्सक को दिखाएं । 

(अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान
के पूर्व सीनियर रेजीडेंट एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव सूदन से बातचीत
पर आधारित)

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