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दो टूक (14 अक्टूबर, 2009)

यह दिल्ली के एक ‘बहुसम्मानित’ एचएचओ की कहानी है। मंगलवार को जब उनके मकानों पर छापे मारे जा रहे थे और जब तमाम चैनल उनके सम्मान समारोहों की पुरानी तस्वीरें दिखा रहे थे, मंचों पर मालाएं पहनने के शौकीन ये जनाब उस समय फरार थे। सिर्फ 35 हजार पगार के बावजूद एक पुलिस अफसर 30 करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टी कैसे बना लेता है, यह अबूझ पहेली नहीं। थानों में नोटों की छपाई कैसे होती है, सब जानते हैं। साल का यह चौथा बड़ा मामला है जिसमें पुलिस वाले हत्थे चढ़े हैं। बेशक सारा पुलिस तंत्र भ्रष्ट नहीं। कुछेक गंदी मछलियां ही हैं। लेकिन बाड़ के द्वारा ही खेत खाए जाने के ऐसे मामलों को क्या तंत्र गंभीरता से ले रहा है? या महज खानापूरी के बाद यह मामला भी रफा दफा हो जाएगा?

 

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  • Web Title:दो टूक (14 अक्टूबर, 2009)