DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हिमालय की नोबल परंपरा का सम्मान

विश्व अर्थव्यवस्था के सबसे बुरे दौर में दुनिया को हिमालय की एक पुरानी परंपरा की याद आई है। इस वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अमेरिका की एलनॉर ओस्ट्रॉम को प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की ऐसी पद्धति को सामने लाने के लिए दिया गया है, जिसकी जड़ें हिमालय की सदियों पुरानी परंपरा में मौजूद हैं। यूं तो ओस्ट्रॉम का अध्ययन का एक हिस्सा नेपाल के किसानों पर केंद्रित है, लेकिन संसाधन प्रबंधन की इस परंपरा का विस्तार उत्तराखंड, हिमाचल और कश्मीर के पर्वतीय इलाकों में भी देखा जा सकता है। उन्होंने बताया है कि किस तरह हिमालय में किसानों द्वारा इस्तेमाल की जा रही सहकारी सिंचाई प्रणालियां बांधों की नई व्यवस्था के बनिस्बत कहीं ज्यादा टिकाऊ और लाभदायक हैं। इसके अलावा ओस्ट्रॉम ने दुनिया भर में किए जा रहे सामुदायिक वनों, मछली पालन, गोचर, जंगल, तालाब आदि के सामुदायिक प्रंबधन के अपने दजर्नों अध्ययनों से साबित किया कि इनके नतीजे पूर्व निर्धारित अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा फलदायी साबित हुए हैं। ओस्ट्रॉम उन प्रचलित धारणाओं को पूरी तरह खारिज करती हैं, जिनके मुताबिक सामुदायिक व्यवस्थाएं सिर्फ कुप्रबंधन का उदाहरण हैं और इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का सक्षमप्रबंधन सरकारी संरक्षण या निजी स्वामित्व में ही संभव है। कश्मीर से अरुणाचल तक हिमालय के दुर्गम इलाकों के बाशिंदे सदियों से अपने वनों और जल संसाधनों का सामुदायिक रूप से प्रबंधन करते आए हैं। प्राकृतिक संसाधनों को राज्य के अधीन कर दिए जाने के दशकों बाद आज भी इन इलाकों की बची-खुची वन और सिंचाई पंचायतें करोड़ों के बजट वाले सरकारी महकमों को बौना साबित कर रही हैं।

ओस्ट्रॉम के काम का निचोड़ उनकी चर्चित पुस्तक ‘गवर्निग द कॉमन्स’ में बेहद व्यवस्थित ढंग से पेश किया गया है। वह सामुदायिक रूप से संचालित होने वाली प्राकृतिक संसाधनों की उन गैर-बाजार आधारित व्यवस्थाओं की मुरीद हैं, जिनके उदाहरण दुनिया के अगड़े-पिछड़े तमाम देशों में पाए जाते हैं। इन संसाधनों में ग्रामवन, गोचर-पनघट, नदी के कछार की खेती लायक जमीन, सिंचाई व पेयजल स्रोत, सामुदायिक तालाब और मछलियां आदि आते हैं। आम तौर पर ये संसाधन स्थानीय राजनीतिक प्रभुत्व या सरकारी भ्रष्टाचार के सहारे लूट-खसोट की भेंट चढ़ जाते हैं। जाहिर है, ऐसे में उन्हें निजी स्वामित्व या किसी सरकारी महकमे के हाथों सौंपने के तर्क आधार बना लेते हैं। लेकिन ओस्ट्रॉम उस समाधान की वकालत करती हैं, जिसे लोग सदियों से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में बिना किसी जुमलेबाजी के इस्तेमाल करते रहे हैं। वह सहकारी प्रबंधन की उत्कृष्ठता को उदाहरण देकर सिद्ध करती हैं। ऐसी मजबूत सहकारी संस्थाएं, जिन्हें स्वयं संसाधनों के उपयोगकर्ता बनाते और चलाते हैं। उनका तर्क है कि परस्पर निर्भर समूह किसी सामूहिक हित के लिए चलने वाली व्यवस्था को निजी लाभ, प्रलोभन और मौकापरस्ती के अवसरों के बीच बेहतर ढंग से चलाते हैं। अपने अब तक के अनुभवों के आधार पर ओस्ट्रॉम जोर देकर कहती हैं कि निजी स्वार्थ के मुकाबले सहयोग की भावना मनुष्य को कहीं ज्यादा प्रेरणा देती है।
हिमालयी ग्रामीण व्यवस्थाओं के अलावा ओस्ट्रॉम ने सामुदायिक प्रबंधन में चलने वाले स्विट्जरलैंड के चारागाहों, जापान के वनों और स्पेन व फिलीपींस की सिंचाई प्रणालियों का विस्तृत अध्ययन किया है। वह कहती हैं कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद इन पद्धतियों में नाम और शब्दावलियों का जरूर फर्क हैं लेकिन इनके पीछे का दर्शन एक जैसा है। नोबेल समिति ने ओस्ट्रॉम को नोबेल पुरस्कार से नवाजते हुए नेपाल में एक बांध के नफे-नुकसान पर किए गए उनके अध्ययन का उल्लेख किया और कहा कि उन्होंने आर्थिक विश्लेषणों में आमतौर पर हाशिए पर रहने वाली बाजार से बाहर की सहकारी संस्थाओं को अर्थशास्त्रीय बहस की मुख्यधारा में ला खड़ा किया है। समिति ने सामुदायिक संसाधनों के आर्थिक प्रबंधन के उनके विश्लेषण की भूरि-भूरि प्रशंसा की। ओस्ट्रॉम ने नेपाल के अपने अध्ययन पर दो पुस्तकें लिखीं हैं- ‘इंप्रूविंग इरिगेशन गवर्नेस एंड मैनेजमेट इन नेपाल’ और ‘फ्रॉम फार्मर्स फील्ड्स टू डेटा फील्ड्स एंड बैक: अ सिंथेसिस ऑफ पार्टिसिपेटरी इनफारमेशन सिस्टम्स फॉर इरिगेशन एंड अदर रिसोर्सेज।’
अमेरिका के इंडियाना विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र की प्रोफेसर ओस्ट्रॉम न केवल इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला हैं बल्कि वह वित्तीय गुणा-भाग की मुख्यधारा से बाहर एक तरह से अर्थशास्त्र की परिधि पर खड़ी नजर आती हैं। लहूलुहान बाजार को लेकर मचे हाहाकार के बीच इस बार ऐसे दिग्गज को नोबेल से नवाजे जाने की उम्मीद की जा रही थी, जो इसके लिए कुछ मरहमी नुस्खे बताता। लेकिन नोबेल जूरी ने इस सम्मान के लिए सामुदायिक अर्थशास्त्र की ऐसी दादी को चुना, जो अगड़े देशों की लाइलाज बीमारी का नुस्खा दुनिया के सबसे पिछड़े देश की परम्परा से ढूंढ़कर लाई है। ओस्ट्रॉम की चिंता दुनिया की बढ़ती आबादी और संपन्नता के टापुओं के बीच प्रकृति के उपहारों के बंटवारे को लेकर है। सामान्यतया वाम झुकाव की राजनीति संसाधनों के सरकारी संरक्षण पर जोर देती है तो दक्षिणपंथी निजीकरण के पक्षधर माने जाते हैं। ओस्ट्रॉम का विनम्र प्रतिवेदन है- जहां-जहां प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण-प्रबंधन उपयोग करने वाले (बेचने वाले नहीं) स्थानीय समुदायों ने खुद किया है, वहां इसके बेहतरीन और टिकाऊ परिणाम आए हैं। वह सबूतों के साथ कहती हैं कि यह बात जहां नेपाल जैसे पूरब के दरिद्र देश पर लागू होती है, वहीं स्विट्रजरलैंड और जापान जैसे अति आधुनिक देशों पर भी खरी उतरती है।
दरअसल, ओस्ट्रॉम के काम की महत्ता सिर्फ एक परंपरागत पद्धति का औचित्य सिद्ध करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों के प्रति हमारे नजरिए बदलने की जरूरत की ओर भी इशारा करती है। जलवायु परिवर्तन की बौद्धिक गरमाहट के बीच यह प्रश्न भी विचारणीय है कि कंजूस कुदरत के फल किफायत से खाने के लिए हैं या बाजार की भट्टी में बरबाद करने के लिए? तमाम पुरानी सभ्यताएं हमें सुखी और दीर्घ जीवन के लिए किफायत से चलने और कम खाने की नसीहत देती हैं। दुनिया को रौंदने वाली टेक्नोलॉजी का जन्मदाता विज्ञान भी इंट्रॉपी घटाने यानी कम से कम उलटफेर करने की सलाह देता है। इकोलॉजी हमें कुदरत के भोजनचक्र का अनुसरण करने और धरती को घर और सभी जीव-जंतुओं को घर का सदस्य समझने का पाठ पढ़ाती है। तो फिर हम किसके लिए धरती को बंजर बनाने पर आमादा हैं! 
ओबामा के बाद ओस्ट्रॉम को नोबेल पुरस्कार प्रकारांतर में महात्मा गांधी के दर्शन को एक और सलामी है। ओस्ट्रॉम की आर्थिक विवेचना समुदाय आधारित जीवन पद्धति पर गांधी जी के विचार और दर्शन की बार-बार याद दिलाती है। हिंसा और आर्थिक बवंडर के बीच दुनिया को चलाने वालों को आज गांधी याद आने लगें तो इसका यकीनन स्वागत होना चाहिए।
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में समाचार संपादक हैं
ashutosh.upadhyay@hinduatantimes.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:हिमालय की नोबल परंपरा का सम्मान