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ब्लॉग वार्ता : बाजे वाली गली से

एक गुण्डा जो कवि था। इस तरह की शीर्षक राजकुमार केसवानी ही लगा सकते हैं। नजर पड़ी तो पहले हंसी आई, फिर जब लिखे को पढ़ा तो और हंसी आई। अपनी नादानी और समझ की त्वरित गति पर। इस लेख में केसवानी डेढ़ सौ साल पहले बनारस के एक कवि तेग अली के बारे में बता रहे हैं। लिखते हैं कि तेग अली के बारे में बदमाश दर्पण के सम्पादक नारायण दास लिखते हैं कि पचास के कोठे में सिन, छह फुट ऊंचा कद, सर पर छोटे घुंघराले बालों पर सुनहरे पल्ले का साफा। हाथ में टीके से हाथ भर ऊंची पक्के मिर्जापुरी बांस की लाठी, जिसे बड़े प्यार से तेल पिला-पिला कर पाला गया।

एक तो किताब का नाम बदमाश दर्पण और दूसरा किसी कवि का इतना बेहतरीन शारीरिक वर्णन कम सुना और पढ़ा है। केसवानी इसके बाद गुण्डे का मतलब भी बताते हैं। तेग अली हमारे दौर का गुण्डा नहीं है। वह कोई डेढ़ सौ साल पहले काशी का गुण्डा है। कमजोर और मजलूम लोगों की रक्षा करने वाला। फिर गुण्डा शब्द की उत्पति बताने लगते हैं। संस्कृत के गुण्ड से बना है गुण्डा। गुण्डयति का अर्थ है, आश्रय में आच्छादित कर लेना, रक्षा करना। इस शानदार लेख को पढ़ना है तो क्लिक कीजिए http://bajewaligali.blogspot.com  और प्रवेश कर जाइये राजकुमार केसवानी की बाजे वाली गली में।
केसवानी जी की गलियों में जाने से पहले अपना एक किस्सा बता दूं। नया-नया पत्रकार बना था। भोपाल जाने का मौका मिला तो केसवानी जी के फ्लैट पर गया। बागवानी में हुनरमंद केसवानी जी को देखकर लगा नहीं कि पत्रकार होंगे। तब वो एनडीटीवी के साथ काम करते थे। कमरे में गया तो जो देखा उसका सदमा आज तक मेरे दिलो-दिमाग पर है। केसवानी जी के एक कमरे में पुरानी-पुरानी फिल्मी गीतों का खजाना। भारत पाकिस्तान से लेकर अरब जगत के संगीत उनके दराजों में शान से आसन लगाए महफिल सजा रहे थे। उसी एक कमरे में कुछ घंटे गुजर गए। दूसरे कमरे में गया जहां हर रिपोर्ट की कॉपी और उसके दस्तावेज लाइब्रेरी की तरह सजा कर रखे गए थे। इसी बात का सदमा लग गया कि पत्रकार बनने के लिए इतनी मेहनत करनी पड़ेगी। सब कुछ संजो कर रखना होगा। भोपाल गैस कांड की रिपोर्टिंग के किस्से सुन-सुन कर काफी हताश हो गया। लगा कि राजकुमार केसवानी जैसा बनना मुश्किल होगा। बहुत दिनों तक उन्हें भूलने की कोशिश की। लेकिन अब वो ब्लॉग पर आ गए हैं, अपनी बेहतरीन रचनाओं के साथ।
इजलाल मजीद की बात केसवानी ही कर सकते हैं। उनका एक शेर है-
  ‘दरिया चढ़ा तो पानी नशेबों से भर गया,
  अब के बारिशों में हमारा ही घर गया’।
साहित्यकारों और शायरों की सोहबत में बनते-बिगड़ते केसवानी जी फजल ताबिश का किस्सा बयान करते हुए उनका लिखा पेश करते हैं। मचलते पानी में ऊंचाई की तलाश फजूल, पहाड़ पर तो कोई भी नदी नहीं जाती।
     इस तरह के वाह और आह निकलने के कई मौके मिलते हैं, बाजे वाली गली में। अजीब दुनिया है। राजकुमार केसवानी लिखते हैं- मैं हर इंसान का इस दुनिया की हर उस चीज में जो इस दुनिया को बेहतर बनाती है, उतना ही हक मानता हूं जितना कि अपना।
   बाजे वाली गली में पुरानी फिल्मों, नज्मों और कलाकारों की रोचक बाते हैं।
भोजपुरी की क्लासिक फिल्म बिदेसिया का एक गाने का विस्तार से जिक्र है। राममूर्ति चतुर्वेदी का लिखा- इश्क करे ऊ , जिसके जेब में माल बारे बलमूं। मन्ना डे और महेंद्र कपूर ने गाया है। केसवानी कहते हैं कि अब तक इस गीत को डिजिटलाईज नहीं किया गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इसका एलपी रिकॉर्ड केसवानी के खजाने में हैं। एक बात और। केसवानी जी ने एक लाइब्रेरी की तरह कई दराज बनाये हैं। कैसेट और रिकॉर्ड और पुराने जमाने की फिल्मी पत्रिकाओं को रखने के लिए।
     ऐसे लिखते हैं, जैसे दुनिया का हर कवि और शायर केसवानी जी का दोस्त हो। नवीन सागर की कविताओं को ब्लॉग पर ले आए हैं। यह जानना जरूरी नहीं कि नवीन सागर को ज्ञानपीठ मिला या साहित्य अकादमी। केसवानी के खजाने का हिस्सा हैं तो बेहतरीन ही होंगे। उनकी एक कविता है- यह बहुत अच्छी सरकार है। इसके एक हाथ में सितार, दूसरे में हथियार है। सितार बजाने और हथियार चलाने में तजुर्बेकार है। राजकुमार केसवानी खुद कवि हैं। अपने बारे में कम बात करते हैं। बाजे वाली गली में भी वो दूसरों के बारे में ही बात करते हैं। इस ब्लॉग को पढ़ना शुरू कीजिए। मोदक का मजा मिलेगा और रस का आस्वादन।
ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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