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ज्ञान और व्यवहार

ज्ञान के बाद आता है दर्शन! ज्ञान के आधार पर एक दृष्टिकोण निर्मित होता है। आदमी पहले जानता है, फिर अपनी दृष्टि बनाता है। उसके बाद आचरण और व्यवहार की बात आती है। ज्ञान और आचरण के बीच एक दूरी है श्रद्घा और विश्वास की। जब तक यह दृष्टिकोण (दर्शन) की दूरी समाप्त नहीं होती, तब तक ज्ञान आचरण को प्रभावित नहीं कर सकता। ज्ञान को प्रभावित करता है ज्ञानावरण कर्म और दृष्टि तथा आचरण को प्रभावित करता है मोहनीय कर्म, मूर्च्छा के परमाणु। जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है ज्ञान, दर्शन और चारित्र की दूरी को मिटाना, उनमें सामंजस्य स्थापित करना।
जब अंत:स्नवी ग्रंथियों के स्नवों का संतुलन गड़बड़ा जाता है, तब शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। क्रोध, भय, अहंकार और कामवासना के आवेग शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न करते हैं। क्योंकि इनसे रासायनिक असंतुलन पैदा हो जाता है और उससे शरीर और मन दोनों रुग्ण हो जाते हैं। क्या इस सचाई को आज का डॉक्टर नहीं जानता? क्या इस सचाई को एक मनोवैज्ञानिक नहीं जानता? क्या उनमें यह ज्ञान नहीं है? वे जानने वाले शरीर-चिकित्सक और मनोचिकित्सक स्वयं इन बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। वे क्रोध करते हैं, घृणा करते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं। क्या यह ज्ञान का, जानने का परिणाम है? नहीं। उनके ज्ञान और आचरण में दूरी है। ज्ञान सही है, पर रसायनों के द्वारा वे सही आचरण नहीं कर पा रहे हैं। यह विरोभास सर्वत्र है।
इस भौतिकवादी वातावरण में जीवन के उद्देश्य की उचित मीमांसा नहीं की गई। उसे सही ढंग से नहीं समझा गया। आज की सरकार चाहती है कि उसके राष्ट्र में कोई निरक्षर न रहे। सब साक्षर हों। साक्षरता और शिक्षा का अभियान पूरे वेग से चल रहा है। परंतु इतनी शिक्षा हो जाने पर भी, ज्ञान का इतना विकास हो जाने पर भी, आर्थिक साधनों का विकास हो जाने पर भी, मन की समस्याओं को कोई समाधान नहीं मिल पा रहा है। मन की समस्याएँ बढ़ी हैं और बढ़ती जा रही हैं।

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