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उम्मीद के दिये

पिछले 22 महीनों में औद्योगिक उत्पादन में हुई सबसे ज्यादा वृद्धि ने मंदी से निकलने की उम्मीद के दिये जला दिए हैं। पिछले साल अगस्त के महीने में औद्योगिक उत्पादन की जो वृद्धि दर महज 1.7 प्रतिशत पहुंच गई थी, वही इस साल 10.4 हो गई है। यह जबरदस्त सुधार का संकेत है और सरकार ने भी उम्मीद जताई है कि जब दूसरी तिमाही के अंतिम आंकड़े मिलेंगे तो और सुधार मिलेगा और चौथी तिमाही तक हम मंदी के अंधेरे से निकल जाएंगे। इस दिशा में अगर मैनुफैक्चरिंग, खनन और बिजली क्षेत्रों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है तो कंज्यूमर डय़ूरेबल्स का भी कम सहयोग नहीं है। इन क्षेत्रों में पिछले साल की उत्पादन वृद्धि के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो निश्चित तौर पर स्थितियां बेहद सकारात्मक दिशा में जाती हुई दिख रही हैं। मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र में इस साल अगस्त की वृद्धि दर 10.2 है तो यही पिछले साल 1.7 थी , खनन क्षेत्र में यह वृद्धि आज के 12.9 की तुलना में सिर्फ 2.8 और बिजली क्षेत्र में 10.6 की तुलना में 0.8 थी। लेकिन इनमें सबसे तेज वृद्धि अगर कहीं हुई है तो वह कंज्यूमर डय़ूरेबल्स में। उपभोक्ता क्षेत्र की यह 22.3 प्रतिशत की वृद्धि औद्योगिक चिराग में तेल की तरह है और इसी के चलते इस वृद्धि के जारी रहने पर संदेह भी किए जा रहे हैं।
शेयर बाजार में तेजी, अंबानी बंधुओं में सुलह की उम्मीद और औद्योगिक उत्पादन में आई इस वृद्धि को जहां आर्थिक क्षेत्र में आई दीवाली बताया जा रहा है, वहीं इसको लेकर बहुत ज्यादा खुशी जताने के प्रति सचेत भी किया जा रहा है। दरअसल हमारे सकल घरेलू उत्पाद के 17 फीसदी हिस्से का निर्माण करने वाले इस औद्योगिक उत्पादन में आई वृद्धि के पीछे पिछले साल से दिए जा रहे सरकार के आर्थिक प्रोत्साहनों की बड़ी भूमिका है। सरकार को अपने जबरदस्त पैकेजों की ताकत देखते हुए इतनी वृद्धि की उम्मीद पहले से थी। क्योंकि उसने इन उपभोक्ता उत्पादों और उनके आयात के करों पर जो छूट दी है, उसका आकार भारत के जीडीपी का 12 प्रतिशत तक बताया जाता है। लेकिन छठे वेतन आयोग और त्योहार के मौसम पर सवार हो कर आई यह औद्योगिक बहाली क्या आगे भी जारी रह पाएगी? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर इस आर्थिक बहाली के साथ रिजर्व बैंक ब्याज की दरें बढ़ाने लगेगा तो क्या बहाली की गति बरकरार रह पाएगी? जो भी हो पर इन सवालों का उठना सबेरे का संकेत तो है ही। 

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