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फ्लू से बचने के सूत्र

क्या आप जानते हैं कि त्योहारों की खरीदारी, अपने-परायों से मेल-मिलाप और उनकी खैरियत के हालचाल लेने के इसी मौसम में जुकाम की संक्रामक बीमारी अपने शबाब पर होती है? कुछ लोग आसानी से इसकी गिरफ्त में आकर नाक सुड़कते-खांसते-छींकते नज़र आते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर इसका कोई दांव नहीं चलता। इसकी मूल वजह है इम्युनिटी, यानी हर शख्स की अपनी-अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता। पेश है इस बीमारी से बचाव और मुकाबले की ताकत बढ़ाने के तरीके बताने वाला यह विशेष लेख।


बारिश विदा हो गई है और सर्दी दस्तक देने ही वाली है। इसी सुहाने मौसम में त्योहार और शादी-ब्याह का वो सीज़न आता है, जब लोगों को अपने नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलकर खुशियां बांटने का मौका मिलता है। लेकिन सावधान! यही मौसम संक्रामक बीमारियों के हमले का भी है। इस मौसम में जुकाम और नाक बहने की बीमारी आपको डॉक्टरों के चक्कर लगाने को मजबूर कर सकती है। इससे बचाव का सबसे सही तरीका है अपनी इम्युनिटी बढ़ाना। 
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, दिल्ली में इंटर्नल मेडिसिन के कंसल्टेंट डॉ. नलिन नाग कहते हैं :  हमारे इम्यून सिस्टम की ताकत ही यह फैसला करती है कि हममें से कौन बीमार पड़ेगा, और कौन नहीं। लेकिन दिल्ली के एम्स अस्पताल में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि कई इम्यूनिटी को चुनौती देने वाले भी कई तत्व हैं। वे कहते हैं : पहले की बनिस्पत आजकल हमारा जीवनकाल ज्यादा हो चुका है, और उम्र के साथ-साथ शरीर का रोगों से बचाव का सिस्टम कम असरदार होता जाता है। शहरी इलाकों में भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है, और हाईजीन की कमी और भागदौड़ के चलते संक्रमण की संभावना भी तेजी से बढ़ रही है। फिर स्टेरॉयड जैसी दवाएं भी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर रही हैं।
आधुनिक जीवन शैली के दबाव भी हमारे इम्यून सिस्टम को क्षीण करते हैं। दिल्ली के आशलोक अस्पताल में कंसल्टेंट साइक्लोजिस्ट डॉ. आशिमा पुरी कहती हैं : रोजमर्रा के तनाव- जैसे कि वक्त पर काम पूरा करना या ट्रैफिक जाम, भी हमारी प्रतिरोधक क्षमता पर हमला करते हैं। इनके अलावा, अपोलो अस्पताल के कंसल्टेंट डॉ. एस. चटर्जी के अनुसार शारीरिक मेहनत की कमी, खाने-पीने के प्रति लापरवाही और लंबे अरसे तक बंद दरवाजों के भीतर रहकर काम करने से भी संक्रामक रोगों से लड़ने की ताकत में गिरावट आती है।
टीका कितना असरदार?
फ्लू से बचाव के लिए टीका लगवाना पहली नजर में अच्छा शॉर्टकट तरीका लगता है, क्योंकि इससे कुदरती तौर पर हमारी इम्युनिटी का लैवल बढ़ जाता है। लेकिन कई डॉक्टर हालिया चर्चा में आए स्वाइन फ्लू के बचाव के टीके की तेजी से चल रही तैयारियों को लेकर काफी चिंतित हैं। मसलन, दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में सीनियर मेडिकल कंसल्टेंट डॉ. एस. पी. ब्यौत्र को कंपनियों के इस दावे पर यकीन ही नहीं हो रहा कि वे इस नई-नई बीमारी का सुरक्षित टीका बनाने में कामयाब हो जाएंगी। क्या ऐसी ही चिंता फ्लू के आम टीकों को लेकर नहीं है?
डॉक्टरों का कहना है कि भारत में टीकाकरण अभियान के तहत केवल उन टीकों को शामिल किया जाता है, जिन्हें इंडियन एकेडमी ऑफ पैडिएट्रिक्स ने सुरक्षित और आवश्यक बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के बावजूद आम फ्लू के टीके को इस अभियान की सूची में शामिल नहीं किया गया है। बच्चों को इस मौसम में आम फ्लू के टीके लगवाए जाएं या नहीं, इसे लेकर तो हमारे देश में डॉक्टरों में अब भी बहस चल रही है।
दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल, साकेत में सीनियर कंसल्टेंट डॉ. नितिन वर्मा कहते हैं : हर साल अगस्त-सितंबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश पर फ्लू का नया टीका जारी किया जाता है। इसे सितंबर के महीने में छह माह से बड़ी उम्र के हर बच्चों को लगाना चाहिए। मगर डॉ. ब्यौत्र का मानना है कि बालिगों को केवल अत्यावश्यक टीके ही लगवाने चाहिए। जैसे कि अगर आप किसी खास संक्रमण से प्रभावित इलाके के लोग विदेश के दौरे पर जा रहे हैं, तो संबंधित टीका जरूर लगवाना चाहिए। उनकी राय में बच्चों के लिए उतने ही टीके पर्याप्त हैं, जितने हमारे टीकाकरण अभियान में शुमार किए गए हैं।
कैसे रहें स्वस्थ?
किसी भी शख्स के लिए अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना वैसे ही है, जैसे अपनी सुरक्षा को और पुख्ता कर लेना। बाकी काम संक्रामक हमलावरों से बचकर रहने की आपकी आदतें कर लेंगी। मिसाल के तौर पर हाथों की साफ-सफाई। नई रिसर्च में सामने आया है कि फ्लू से बचाव की तरकीबें अलग-अलग वायरस पर उतनी कारगर नहीं होतीं। इसका असरदार विकल्प है, हाथ धोना।
हाथ धोना
डॉ. नाग कहते हैं, फ्लू के कीटाणु सूंघने से या सांस के जरिए नहीं फैलते हैं, बल्कि ये हमारे हाथों के जरिए चेहरे पर और फिर आंखों, कानों, नाक और मुंह के जरिए हमारे शरीर में हमला करते हैं। हम लोग जाने-अनजाने कई चीजों को छूते रहते हैं - जैसे कि दरवाजे के हैंडल, बिजली के स्विच, टेलीफोन, कीबोर्ड, वगैरह। इनमें छुपे तमाम कीटाणु और बैक्टीरिया हमारे हाथों के जरिए हमारे शरीर में जाकर असर दिखा देते हैं।
रिस्क एनेलेसिस नामक जर्नल में पिछले महीने प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया कि अमेरिकी छात्र लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय औसतन हर चार मिनट में एक बार अपने नाक, होंठ या आंखों को छूते हैं। इसलिए अच्छा यही है कि अगर आप घर में हैं, तो न केवल खाने से पहले, बल्कि छींकने या खांसने के बाद भी समय-समय पर हाथ धोते रहें और सैनिटाइजर या टिश्यू पेपर अपने साथ रखें। डॉ. नाग की सलाह है कि आपको किसी भी संक्रमण संभावित चीज को छूने के बाद या बाहर से घर में आते ही हाथ धोने की आदत डाल लेनी चाहिए। इसके अलावा, सार्वजनिक परिवहन के साधनों, मॉल्स और स्टेशन के एलीवेटर्स या रेस्तरां में जहां तक हो सके, कम से कम चीजों या जगह को छूना चाहिए। उस दौरान चेहरे पर हाथ फेरने से बाज आएं।

दिल्ली के महक स्किन क्लिनिक की कंसल्टेंट डॉ. शैला अग्रवाल कहती हैं : हालांकि एंटी-बैक्टीरियल सोप काफी पॉपुलर हैं, लेकिन अगर आम साबुन से भी हाथ धो लिए जाएं, तो काफी है। वे खुश्क त्वचा के लिए मॉइश्चराइजर के इस्तेमाल को भी सही बताती हैं, क्योंकि इससे त्वचा के छिद्र बंद होने से संक्रमण से बचाव हो जाता है। हर शख्स के लिए अपने संक्रामक कीटाणुओं को आगे न फैलाना भी जरूरी है। इसके लिए डॉक्टर छींकते और खांसते समय रुमाल के बजाय टिश्यू पेपर के इस्तेमाल की राय देते हैं। अगर टिश्यू पेपर न हो, तो हाथ के बजाय अपनी कुहनी के मोड़ की आड़ में खांसें। जहां तक संभव हो किसी बीमार व्यक्ति के सीधे संपर्क में न आएं। खांसने-छींकने वाले से तीन फीट और जुकाम से ग्रस्त शख्स से छह फीट की दूरी बनाकर रखना ठीक रहता है। त्योहार के इस मौसम में लोगों से पास आकर मिलने, हाथ मिलाने, चूमने और गले लगने में भी संक्रमण का खतरा रहता है। दूर से नमस्ते कहकर अभिवादन करना ही सबसे ज्यादा हाईजीनिक और सुरक्षित तरीका है।
आराम और रिलेक्सेशन
डॉ. पुरी की राय में रिलेक्सेशन की कोई भी तरकीब (चाहे वह ऐरोबिक्स, ध्यान, योग, टहलना, किताब पढ़ना या दोस्तों से मिलना कुछ भी हो) नियमित आधे घंटे तक अपनाने से स्ट्रैस हारमोन रिलीज होने में रुकावट आती है, और इम्यूनिटी का फंक्शन बढ़ जाता है।
हर शख्स के लिए सात से आठ घंटे की नींद जरूरी है। डॉ. चटर्जी का कहना है कि नींद हमारे शरीर की मरम्मत और खामियां दूर करने का साधन है। इसलिए हमारे सोने और जागने का एक समय निश्चित होना चाहिए, और इस टाइम टेबल का पालन छुट्टी के दिनों में भी होना चाहिए। अगर आपको सोने में कोई परेशानी होती है, तो दिन में अपनी शारीरिक गतिविधियां बढ़ा देनी चाहिए। मगर शाम को कसरत करने से आपको नींद में दिक्कत आ सकती है। सोने से पहले गुनगुने पानी से नहाना भी नींद के लिए मुफीद रहता है। बिस्तर पर लेटते ही गहरी सांस लेकर सबसे पहले पूरे शरीर को रिलेक्स करने की आदत डालें।
सही खानपान
 सही खानपान से भी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। बेंगलुरु के मणिपाल अस्पताल में चीफ डायटीशियन डॉ. ज्योति प्रसाद के शब्दों में, ‘हमारे इम्यून सिस्टम का तीस से चालीस प्रतिशत हिस्सा तो खानपान और पाचन पर ही निर्भर करता है। दही जैसे प्रोबायोटिक्स की दैनिक खुराक शुगर, मीट, दवाओं और तले-भुने भोजन की वजह से शरीर में होने वाले कुदरती असंतुलन को ठीक करती है। दिन में पांच फल या सब्जी खाने का नियम बना लें। अपनी खाने की थाली को रंगबिरंगी बनाएं। जितने ज्यादा रंग, उतना ही पौष्टिक खाना। मेवे और ऑयलसीड्स भी इम्यूनिटी के जबर्दस्त भंडार होते हैं। इसके अलावा, ग्रीन टी भी सर्दी जुकाम से लड़ने की भरपूर ताकत देती है। कई अध्ययन में इसकी पुष्टि हो चुकी है। (मिंट से)

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