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टीबी का इलाज

कुछ टेस्ट शरीर में कहीं भी टीबी के बैक्टीरिया की उपस्थिति का पता लगा देते हैं। बांह में टीका लगाकर 72 घंटों बाद पढ़े जाने वाला ट्युबरकुलिन टेस्ट और माइक्रोबैक्टीरिया के लिए किया जाने वाला एलाइजा टेस्ट पॉजीटिव आने पर टीबी की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन कुछ मामलों में सभी जांच हो जाने पर भी स्पष्ट नतीजे नहीं प्राप्त हो पाते और अनुमान के आधार पर ही रोगी और उसके परिवारजनों से सहमति लेकर तपेदिक-रोधी दवाएं शुरू करनी पड़ती हैं। 
संक्रमण का डर
टीबी रोगी का सामाजिक बहिष्कार करना सर्वथा अनुचित है। सच तो यह है कि तपेदिक के कुछ ही रोगी दूसरों के लिए खतरनाक साबित होते हैं। रोग उन्हीं रोगियों से फैलता है, जिनके फेफड़ों में माइक्रोबैक्टीरिया जख्म बना देता है। इन जख्मों में माइक्रोबैक्टीरिया बड़ी संख्या में पनपते हैं और रोगी की सांस के साथ हवा में पहुंच उसे दूषित करते हैं। शरीर के किसी भी दूसरे अंग की टीबी के फैलने की लेशमात्र भी संभावना नहीं होती, लेकिन लोग फिर भी डरते हैं। दवा शुरू होते ही माइक्रोबैक्टीरिया मरने लगते हैं और तीन हफ्तों बाद ही रोग फैलने का खतरा प्राय: खत्म हो जाता है। 
इलाज कितना कामयाब
उचित इलाज से टीबी के 95 प्रतिशत रोगी पूरी तरह भले-चंगे हो जाते हैं। इसके लिए रोगी को कम से कम 6-9 महीने लगकर दवा लेनी पड़ती है। हड्डियों, जोड़ों, आंतों और लिम्फ नोड की तपेदिक का उपचार 18 महीनों तक करना पड़ता है।

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