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1962 के युद्ध के कारणों का विश्लेषण जरूरी: नटवर

पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह ने खेद जताया कि भारत ने 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के पीछे के कारणों की अभी तक व्यापक समीक्षा नहीं की है तथा इस प्रक्रिया की वाकई जरूरत है।

अपनी नई पुस्तक 'माई चायना इयर्स, 1956-88'  के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने पिछले 60 साल में भारत चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं को छुआ और उनका मानना है कि यदि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव जीत लिए होते तो चीजें अलग होती। सिंह ने युद्ध के ब्यौरों का खुलासा करने की सरकार की गुप्त नीति की परोक्ष आलोचना करते हुए कहा, 1962 क्यों हुआ। हमारी तरफ से इसके बारे में कोई गंभीर विश्लेषण नहीं किया गया।

चीन के साथ हुए युद्ध के बारे में उन्होंने कहा कि माओत्से तुंग ने भारत को सबक सिखाने का निर्णय किया, क्योंकि उनका मानना था कि हम उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने 1960 में चीन के साथ मुद्दे के समाधान का मौका गंवा दिया क्योंकि देश सत्ता का खेल नहीं समझ पाया। उन्होंने अपनी इस टिप्पणी पर कुछ अधिक कहने से इंकार कर दिया। सीमा विवाद पर उन्होंने कहा कि तवांग 1953 में भारत के नक्शे में नहीं था।

राजीव गांधी की 1988 की चीन यात्रा को गतिरोध समाप्त करने वाली यात्रा करार देते हुए नटवर सिंह ने कहा कि यदि पूर्व प्रधानमंत्री ने 1989 का चुनाव जीत लिया होता तो चीजें  बिल्कुल अलग होती। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी ने मुझसे आगे बढ़ने और चीन के साथ राह निकालने को कहा था। राजीव ने मुझसे कहा था कि उन पर 1962 का कोई दबाव नहीं है।

राजीव गांधी से अपने संबंधों की याद करते हुए उनहोंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री चीन यात्रा पर जाना चाहते थे जबकि पी वी नरसिंह राव तथा विदेश मंत्रालय के कई शीर्ष अधिकारी इसके पक्ष में नहीं थे जिनमें जी पार्थसारथी शामिल थे। सिंह ने कहा कि यदि राजीव पद पर रहे होते तो चीजें बिल्कुल अलग होती। वह काम में विश्वास करते थे प्रतिक्रिया में नहीं। चीन के साथ अच्छे संबंध भारत के हित के लिए जरूरी करार देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना नहीं है क्योंकि द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है।

उन्होंने 1966 में ताशकंद में लालबहादुर शास्त्री की मत्यु के संबंध में मास्को के भारतीय दूतावास के साथ हुए कथित पत्राचार को सार्वजनिक नहीं करने के लिए सरकार की आलोचना की। अमेरिका के साथ संबंधों के कारण चीन के संबंधों पर असर पड़ने संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा कि भारत को किसी झंसे में नहीं आना चाहिए। इस संदर्भ में सिंह ने कहा कि उनका मानना है कि मनमोहन सिंह अमेरिका समर्थक नहीं हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन में खुद को अवांछित व्यक्ति करार देते हुए पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि विश्व समुदाय मनमोहन को गंभीरता से लेता है। उनका कद काफी बढ़ा है।

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