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पहाडों में कई जगह महीने बाद मनाई जाती है दीपावली

पूरे देश में दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है लेकिन पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में कुछ जगहों पर यह त्योहार एक माह बाद मार्गशीर्ष (अगहन) मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में इस दीवाली को (देवलांग) के नाम से जाना जाता है।

देशवासी जब कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली का जश्न मनाने में मशगूल रहते हैं तब टिहरी गढवाल और उत्तरकाशी के रवांई और देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र के लोग सामान्य दिनों की तरह अपने कामधंधों में लगे रहते हैं। उस दिन वहां कुछ भी नहीं होता। इसके ठीक एक माह बाद मार्गशीर्ष (अगहन) अमावस्या को वहां दीवाली मनाई जाती है,जिसका उत्सव चार-पांच दिन तक चलता है।

इन क्षेत्रों में दीवाली का त्योहार एक माह बाद मनाने का कोई ठीक इतिहास तो नहीं मिलता है लेकिन इसके कुछ कारण लोग बताते हैं। कार्तिक मास में किसानों की फसल खेतों और आंगन में बिखरी पडी रहती है, जिसकी वजह से वे अपने काम में व्यस्त रहते हैं और एक माह बाद जब सब कामों से फुर्सत होकर घर में बैठते हैं, तब वहां दीवाली मनाई जाती है।

कुछ लोगों का कहना है कि लंका के राजा रावण पर विजय हासिल करके भगवान राम कार्तिक माह की अमावस्या को अयोध्या लौटे थे। इस खुशी में वहां दीवाली मनाई गई थी लेकिन यह समाचार इन दूरस्थ क्षेत्रों में देर से पहुंचा, इसलिए अमावस्या को ही केन्द्रबिंदु मानकर ठीक एक माह बाद दीपोत्सव मनाया जाता है।

एक अन्य प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय टिहरी नरेश से किसी व्यक्ति ने वीर माधो सिंह भंडारी की झूठी शिकायत की, जिस पर उन्हें दरबार में तत्काल हाजिर होने का आदेश दिया गया। उस दिन कार्तिक मास की दीपावली थी। रियासत के लोगों ने अपने प्रिय नेता को त्योहार के अवसर पर राजदरबार में बुलाए जाने के कारण दीपावली नहीं मनाई और इसके एक माह बाद भंडारी के लौटने पर अगहन माह में अमावस्या को दीवाली मनाई गई।

ऐसा कहा जाता है कि किसी समय जौनसार बावर क्षेत्र में सामू शाह नाम के राक्षस का राज था, जो बहुत  निरंकुश था। उसके अत्याचार से क्षेत्रीय जनता का जीना दूभर हो गया था, तब पूरे क्षेत्र की जनता ने उसके आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए अपने ईष्टदेव महासू से प्रार्थना की। उनकी करुण पुकार सुनकर महासू देवता ने सामू शाह का अंत किया। उसी खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।

शिवपुराण और लिंग पुराण की एक कथा के अनुसार एक समय प्रजापति ब्रह्मा और सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर आपस में संघर्ष होने लगा और वे एक-दूसरे के वध के लिए तैयार हो गए। इससे सभी देवी-देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने देवाधिदेव शिवजी से प्रार्थना की। शिवजी उनकी प्रार्थना सुनकर विवाद स्थल पर ज्योतिर्लिंग महाग्नि स्तम्भ के रूप में दोनों के बीच खडे हो गए। उस समय आकाशवाणी हुई कि दोनों में से जो इस ज्योतिर्लिंग के आदि और अंत का पता लगा लेगा, वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्माजी ऊपर को उडे और विष्णुजी नीचे की ओर। कई वर्षों तक वे दोनों खोज करते रहे लेकिन अंत में जहां से निकले थे, वहीं पहुंच गए। तब दोनों देवताओं ने माना कि कोई उनसे भी श्रेष्ठ है और वे उस ज्योतिर्मय स्तंभ को श्रेष्ठ मानने लगे।

इन क्षेत्रों में महाभारत में वर्णित पांडवों का विशेष प्रभाव है। कुछ लोगों का कहना है कि कार्तिक मास की अमावस्या के समय भीम कहीं युद्ध में बाहर गए थे। इस कारण वहां दीवाली नहीं मनाई गई। जब वह युद्ध जीतकर आए तब खुशी में ठीक एक माह बाद दीवाली मनाई गई और यही परम्परा बन गई।

कारण कुछ भी हो लेकिन यह दीवाली जिसे इन क्षेत्रों में नई दीवाली भी कहा जाता है, जौनसार बावर के चार-पांच गांवों में मनाई जाती है। वह भी महासू देवता के मूल हनोल और अटाल के आसपास। इन इलाकों में एक परम्परा और भी है। महासू देवता हमेशा भ्रमण पर रहते हैं और अपने निश्चित ग्रामीण ठिकानों पर 10-12 साल बाद ही पहुंच पाते हैं। वह जिस गांव में विश्राम करते हैं, वहां उस साल नई दीवाली मनाई जाती है जबकि बाकी क्षेत्र में (बूढी दीवाली) का आयोजन होता है।

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