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..ताकि बेहतर हो आपकी दिवाली

..ताकि बेहतर हो आपकी दिवाली

पेशे के प्रति समर्पण नहीं, इसे काम के प्रति समर्पण कहा जाना चाहिए या व्यक्तिगत इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अतिरिक्त प्रयास। मधु अरोड़ा नोएडा स्थित एक कॉल सेंटर में काम करती हैं। पिछली दिवाली की रात उसने अपने ऑफिस में ही बिताई थी। उसका कॉल सेंटर फ्रांस, इटली और जर्मनी के क्लाइंट्स को केटर करता है। वहां कैसी दिवाली? मधु कहती हैं, ‘मुझे अगर तरक्की चाहिए तो यह करना ही होगा। इससे बॉस पर अच्छा इंप्रेशन पड़ता है, क्योंकि उस दिन कोई काम नहीं करना चाहता। पिछली दिवाली को जब मैं ऑफिस पहुंची तो मेरे बॉस बहुत खुश हुए। दूसरे लोग भी थे, सो हमने मिल कर ऑफिस के बाहर पटाखे छोड़े। उस दिन खाना बाहर से मंगाया गया था। बॉस सबके लिए गिफ्ट भी लेकर आए थे। बस, हमारी दिवाली अच्छी बीत गई। यह बात और है कि मेरी सास ने मुङो हर तरह के सवाल किए। परिवार के कुछ लोगों ने ताने भी दिए, पर क्या करती!’
‘कई बार तो दिवाली या दूसरे त्योहार पता भी नहीं चलते। हमारा काम ही ऐसा है।’ जेट एयरवेज में काम करने वाली शिखा कहती हैं, ‘अगर दिवाली की रात आपकी फ्लाइट है तो आपको ड्यूटी पर हाजिर रहना ही होगा।’ एयर इंडिया में एयर होस्टस कविता कामत कहती हैं, ‘अगर फ्लाइट एब्रॉड की है तो कोई भी त्योहार पता नहीं चलता। पिछली दिवाली मैं बैंकॉक में थी। वहां कुछ परिचितों के साथ मिल कर दिवाली मना ली थी, सज-धज ली थी। लेकिन अगर उस दिन की फ्लाइट होती तो वह मज भी चला जाता।’

चॉकलेट के एक ब्रांड का विज्ञापन है, इस दिवाली उन खास लोगों का मुंह मीठा कीजिए, जिनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता। इसमें दिवाली की रात पित्ज डिलीवर करने वाले लड़के को चॉकलेट बॉक्स गिफ्ट किया जाता है। ट्वेंटी फोर बाई सेवन काम करने वालों को ऐसे ही प्यार और मान्यता की जरूरत है, क्योंकि अक्सर वे काम करते रहते हैं, तभी हमारी जिंदगी चलती है।’

क्या करें,मजबूरी है
‘दिवाली के दिन कई बार हमें ज्यादा काम करना पड़ता है, क्योंकि हमारा काम इस दिन बढ़ जाता है।’ सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में काम करने वाली नर्स सिस्टर एडविना कहती हैं। दिवाली पर जलने, चोट लगने आदि के मामले दूसरों दिनों के मुकाबले ज्यादा आते हैं। ऐसे में आने वाले मरीजों की तीमारदारी के लिए तैनात रहना पड़ता है।’ सिस्टर एडविना के अनुसार, ‘यह हमारे काम की मजबूरी है। इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। घर पर भले बच्चे और परिवार के दूसरे लोग त्योहार मनाएं, हमारे पेशे का दायित्व ऐसा है कि हमें अस्पताल में रह कर इसे पूरा करना होता है।’

नर्सिग जैसे पेशे को इसीलिए सलाम किया जाना चाहिए। एक अन्य सरकारी अस्पताल की नर्स सिस्टर शीला कहती हैं, ‘हम अपना काम करते हुए भी त्योहारों पर खुशियां मना सकते हैं। अगर उस दिन नाइट डच्यूटी होती है तो हम घर से मिठाइयां और खाने की दूसरी चीजें बना कर ले आते हैं। अपने वार्ड में मोमबत्तियां जला लेते हैं।’ सिस्टर शीला हंस कर कहती हैं, ‘यह जरूर है कि इस पेशे में आपका व्यक्तिगत जीवन कुछ भी नहीं होता। छुट्टी तो छोड़िए, कई बार त्योहारों की खरीदारी करना भी मुश्किल होता है। वैसे, इस साल तो यह अच्छा ही है, क्योंकि बाजर में चीजों की कीमत आसमान छू रही है। हां, बच्चों को कई बार समझना मुश्किल होता है।’

‘बेशक, महंगाई चरम पर है, पर त्योहारों पर तो खर्चा करना ही पड़ता है’ सब इंस्पेक्टर नीलिमा ¨सह कहती हैं। पिछली दिवाली को वह उत्तरी दिल्ली स्थित थाने में तैनात थीं। इस बार उन्हें अपनी डच्यूटी का शडच्यूल नहीं पता, फिर भी इतना तो तय है कि उन्हें उस दिन छुट्टी नहीं मिलेगी। नीलिमा कहती हैं, ‘मेरी शादी नहीं हुई है और अक्सर ऐसे मौकों पर उन महिला पुलिसकर्मियों को छुट्टी मिल जती है, जो शादीशुदा होती हैं। हमें यह कह कर छुट्टी नहीं दी जती कि तुम घर जकर क्या करोगी? जसे मेरा अपना परिवार तो है ही नहीं।’ फिर भी नीलिमा इस बात पर फा करती हैं कि वह एक जिम्मेदार पेशे से जुड़ी हैं। वह कहती हैं, ‘भले यह हमारी मजबूरी है, लेकिन यह हमारा दायित्व भी है। हम थाने में ही दिवाली मना लेते हैं, पटाखे छोड़ते हैं और मिठाइयां बांट लेते हैं।’

अपनी पसंद से चुना यह पेशा
‘हमारे लिए कोई त्योहार नहीं, कोई समारोह नहीं, पर हमें कोई शिकायत नहीं। हमने अपनी पसंद से यह पेशा चुना था और इसे चुनने से पहले हम इसकी सीमाएं जनते थे।’ टीवी 18 में काम करने वाली अमृता कहती हैं। उनके अनुसार, ‘मीडिया, खासकर न्यूज चैनल्स में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियों और महिलाओं को इस बात का अहसास होता है कि उनके पेशे की क्या मजबूरियां होती हैं। त्योहारों पर कोई काम क्यों करना चाहेगा? वह क्यों चाहेगा कि परिवार के बिना उसे यह दिन मनाना पड़े, वह भी काम करते हुए? पर अगर आपका चैनल चौबीसों घंटे चलता हो, आपको लोगों को अपडेट रखना हो तो आप क्या कर सकते हैं।’ एनडीटीवी इंडिया में काम करने वाली शैली के अनुसार, ‘ऐसे में ऑफिस में त्योहार मना लेना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है। यहां भी कई-कई साल से साथ काम करने के कारण लोग परिवार के सदस्यों जैसे हो जाते हैं।’ सहारा समय में काम करने वाली अनीता कहती हैं, ‘कई बार हमारे वरिष्ठ ही हमें दिवाली मनाने की छुट्टी दे देते हैं या दिन की शिफ्ट लगा कर, शाम को थोड़ा जल्दी  जने की छूट मिल जती है।’ वसे डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों को तो छुट्टी मिल जती है या समय में छूट, लेकिन रिपोर्टर्स का क्या? टीवी टुडे की आशिमा कहती हैं, ‘अगर आपको दिवाली की रिपोर्टिग करनी है या आप पर एंकरिंग का जिम्मा है तो समझ लीजिए कि आप फंस गईं। फिर भी हमारे काम में एक अलग तरह का मजा है।’

ग्लैमर खासकर फिल्मों और टीवी की दुनिया में भी आप घड़ी और कैलेंडर नहीं देख सकते। फिल्मों में तो फिर भी समय मिल जाता है, लेकिन डेली सोप्स ने तो टीवी कलाकारों का दम ही निकाल कर रख दिया है। कई बार त्योहारों पर भी इनकी शूटिंग चलती रहती है। बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ काम करने वाली एक सीनियर ऐक्ट्रेस का कहना है कि हमें बहुत टाइट शडच्यूल में काम करना पड़ता है। दिवाली पर तो छोड़िए- कई कलाकारों को तो अपने परिजनों की मौत पर भी घर जाने की अनुमति नहीं मिलती। ‘बिदाई’ फेम एक्ट्रेस पारुल चौहान कहती हैं, ‘हमारे प्रोडच्यूसर्स इतने निर्दयी नहीं, लेकिन त्योहारों और खास दिनों पर भी कई बार सुबह हमें शूट पर आना होता है, क्योंकि हर दिन शूटिंग करके ही हम पांच दिनों का एपीसोड टेलीकास्ट कर पाते हैं। वसे त्योहारों पर हमें शूट पर आना अच्छा लगता है, क्योंकि हममें से बहुत से कलाकार अपने परिवारों के बिना मुंबई में रहते हैं और एक परिवार का हिस्सा बन गए हैं। यहां त्योहार मनाना, हमें ज्यादा अच्छा लगता है।’

कमोबेश इसी स्थिति से कॉल सेंटरों में काम करने वाली लड़कियों, महिला डॉक्टरों और एयर होस्टेसेज को भी गुजरना पड़ता है। उनकी दिवाली भी डच्यूटी करते हुए ही मनती है और इसी में उन्हें खुशी भी मिलती है। 

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