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अगर वह विमान दुर्घटना न होती तो ..

मैं फिलिप्स रॉथ का उपन्यास ‘द प्लॉट अगेंस्ट अमेरिका’ पढ़ रहा था। यह एक अद्भुत् लेखक का अदुभुत उपन्यास है। यह इस परिकल्पना पर खड़ा है कि 1940 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में अगर फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट के खिलाफ मशहूर विमान चालक चार्ल्स लिडेनबर्ग चुनाव लड़ते तो क्या होता? और अगर वे जीत जाते तो क्या होता? लेखक ने अपनी किताब में इस बात का चित्रण किया है कि लिडेनबर्ग की राष्ट्रपति काल में अमेरिका कैसा होता।

कहानी न्यू जर्सी के यहूदी परिवार से ही शुरू होती है, जो एक परिवार से शुरू होकर पूरे देश की जिंदगी पर पहुंच जाती है। इस काल्पनिक इतिहास में लिडेनबर्ग हिटलर से समझौता कर लेते हैं, अमेरिका को युद्ध से बचा लेते हैं और पूर्वी तट पर रहने वाले यहूदियों में उन्माद जगा देते हैं। रॉथ की कहानी पढ़कर मैं भारत के बारे में सोचने लग गया। अपने अगले कुछ कॉलम मैं ऐसी ही काल्पनिक स्थितियों पर लिखूंगा। ऐसी ही एक कल्पना है कि अगर सुभाष चंद्र बोस दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारत लौटते तो क्या होता?

यह माना जाता है कि बोस का निधन फारमोसा (उस समय ताईवान का यही नाम था) से उड़ान भरते समय 18 अगस्त 1945 में वायुदुर्घटना में हो गया था। अगर यह दुर्घटना न हुई होती। उसी महीने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। अगर बोस विमान पर बैठे ही न होते या फिर वे विमान सुरक्षित उतर गया होता तो क्या होता? जाहिर है कि वे देश वापस आते और ब्रिटिश शासकों से भारत को आजाद कराने की लड़ाई जारी रखते। यह भी हो सकता है कि वे सीधे भारत न लौटते, कुछ समय के लिए रूस या चीन कहीं शरण ले लेते। लेकिन कुछ समय में ही वे भारत का रुख करते।

उस साल का अंत आते-आते ब्रिटिश सरकार ने भारत में ज्यादा दिन टिकने का इरादा छोड़ दिया था। युद्ध ने उन्हें थका भी दिया था और कंगाल भी बना दिया था। विंस्टन चर्चिल की साम्राज्यवाद समर्थक सरकार की जगह लेबर पार्टी की सरकार सत्ता मे आ चुकी थी और भारत को आजादी देने को प्रतिबद्ध थी। वायॅसराय लार्ड वेवेल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ विभाजन की औपचारिकताएं तय करने के लिए शिमला में बैठक कर रहे थे। सबके दिमाग में एक ही सवाल था कि जब ये लोग भारत से जाएंगे तो पीछे एक देश छोड़कर जाएंगे या दो देश।

जापान में हार के बाद आजाद हिंद फौज के बहुत सारे सदस्य भारत लौट आए। आम सैनिकों को तो अपने गांव जाने दिया गया, लेकिन इसके आला अधिकारियों को रोक लिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने ब्रिटिश इंडियन आर्मी से बगावत करके दुश्मन का साथ दिया। मुकदमा लाल किले में चला, जिस पर पूरे देश का ध्यान था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जवाहरलाल नेहरू ने उनकी तरफ से पैरवी की।

क्या होता अगर सुभाष चंद्र बोस खुद 1945 या 1946 में आ गया होते? ब्रिटिश सरकार उन पर बगावत का आरोप नहीं लगा सकती थी, क्योंकि वे तो कभी उनकी सेना में थे ही नहीं। क्या उन पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा चलाया जाता? कुछ वैसे ही जैसे आरोप वरिष्ठ ब्रिटिश राजनेता जॉन एंब्रे पर लगाए गए थे और आखिर में उन्हें फांसी दे दी गई थी। क्या ऐसा ही कुछ सुभाष चंद्र बोस के साथ भी होता? यह भी आसान नहीं था, क्योंकि बोस ब्रिटिश नहीं थे, हालांकि वे भारतीय भी नहीं थे, क्योंकि उस समय भारत नाम का राष्ट्र था ही नहीं।

युद्ध की समाप्ति पर बोस अगर भारत लौटते तो ब्रिटिश सरकार के लिए भी परेशानी खड़ी होती। वे आजाद हिंद फौज के सभी अफसरों को कड़ी सजा देकर एक उदाहरण कायम करना चाहती, लेकिन भारत जनसमर्थन उन्हें इस कदम से रोकता। आखिर में उन्हें सबको रिहा करना पड़ता। पर ब्रिटिश सरकार नेहरू व अन्य राष्ट्रवादियों को इस बात के लिए राजी कर लेती कि आजाद हिंद फौज के सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल न किया जाए।

क्या ब्रिटिश सरकार बोस पर मुकदमा चलाती? बहुत मुश्किल था, क्योंकि बोस के साथ भारी जनसमर्थन था। मुकदमा तो उन्हें और लोकप्रिय बना देता। शायद उन्हें राजनीति में फिर से सक्रिय होने दिया जाता। क्या वे अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में लौटते? या वे खुद की नई पार्टी बनाते- फारवर्ड ब्लॉक। इसका फैसला वे निजी समीकरण और राजनैतिक जोड़-घटाव से करते। यह भी हो सकता था कि महात्मा गांधी उन्हें मना लेते।

वे बोस को नेहरू और सरदार पटेल के साथ मिलकर अंग्रेजों और मुस्लिम लीग से निपटने के लिए तैयार कर लेते। दूसरी तरफ बोस के लिए 1939 के उस घाव का भुलाना आसान नहीं होता, जब उन्हें कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़नी पड़ी थी और उनके पास कांग्रेस छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। हालांकि बोस की वापसी का सत्ता के हस्तांतरण पर कोई असर नहीं पड़ता। 1947 में भारत आजाद भी होता और उसका विभाजन भी होता। लेकिन असली सवाल इसी के बाद आता है कि आजाद भारत में सुभाष चंद्र बोस की राजनीति और कार्यक्रम क्या होते?

अगर वे भारत वापसी के बाद कांग्रेस में शामिल भी हो जाते तो आजादी के बाद उनका उसमें बना रहना शायद मुमकिन न होता। वे इतने आत्मसम्मान वाले और स्वतंत्र चेता थे कि जवाहरलाल नेहरू को आला नेता के रूप में स्वीकार न कर पाते। इसके बाद वे क्या करते? या तो वे अपनी पार्टी बनाते या फिर पूर्व कांग्रेसियों के साथ वाममार्ग को रुख करते। यही रास्ता आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया ने अपनाया था, वे सब नेहरू की कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा समतावादी थे और सोवियत परस्त कम्युनिस्ट पार्टी के मुकाबले ज्यादा देशभक्त।

इतिहास में तो समाजवादी कांग्रेस का बाल-बांका नहीं कर सके। हो सकता है कि बोस की अगुवाई में समाजवादी नेहरू के लिए बड़ी चुनौती बनते। स्वतंत्रता संग्राम की विरासत के चलते कांग्रेस पहला आम चुनाव तो खैर जीत ही लेती, ओर शायद दूसरा व तीसरा भी। इसके बाद जनता विकल्प ढूंढ़ती। निश्चित तौर पर बोस की अपील बाकी समाजवादी नेताओं के मुकाबले ज्यादा बड़ी होती। और 1957 नहीं तो 1962 के चुनाव में वे कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते। बोस की उम्र नेहरू के मुकाबले आठ बरस कम थी यह भी उन्हें फायदा ही पहुंचाता। बोस नेहरू से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते या नहीं यह हम नहीं कह सकते। हम बस इतना कह सकते हैं कि अगर 1945 में विमान दुर्घटना न हुई होती तो इतिहास बदल गया होता।

ramguha @vsnl .com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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