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युवा पीढ़ी के गांधी

बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार मिला तो एक बार फिर गांधी याद आ गए। ओबामा की दिली तमन्ना है कि वे गांधी के साथ भोजन कर पाते। ओबामा की तरह ही मार्टिन लूथर किंग और लुई फिशर उनके मुरीद थे। लुई फिशर ने तो कहा भी था, ‘गांधी का जीवन मानवता की हुत सी समस्याओं का हल पेश करता है, बशर्ते हम केवल वही करें, जो उन्होंने किया था।’

अभी चंद रोज पहले ही दुनिया भर में कई देशों ने गांधी को बड़े सम्मान से याद किया था। भारत में भी स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और राजनेताओं ने अपने अपने ढंग से उनकी समृति को अर्ध्य दिया। मगर युवा पीढ़ी उस दिन क्या कर रही थी? उस दिन मिला एक एसएमएस चौंकाने वाला है- ‘आज रात गांधी जंयती पर मिलें। हम ताश, शराब और कबाब से मनाएंगे यह दिन।’ यह उस महात्मा गांधी की जयंती के बारे में है, जिन्होंने सारा जीवन चरित्र निर्माण की बात की। जो गाय-भैंसों पर होने वाले अत्याचार तक को नहीं सह पाए और जीवन भर बकरी का दूध पीने का संकल्प ले लिया। जीवन भर सात्विक भोजन लिया। पर नौजवान पीढ़ी के लिए उनकी यह प्रासांगिकता क्यों बदल गई?

यह एसएमएस जिस मस्ती की ओर इशारा कर रहा है, उसके पीछे क्या मानसिकता है? आदर्शो की व्यवहारिकता से क्या उनका मोहभंग हो गया है। या फिर बड़ों ने जो आचार संहिता बनाई हैं, उसके उल्लंघन में ही वे असल सुख अनुभव करते हैं। जाहिर है कि वे दीपावली भी इसी तरह मनाएंगे। ताश की बाजियां तो खैर अभी से शुरू हो भी गई हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण से पता चला कि युवा पीढ़ी के लोग स्वदेशी के बजाए विदेशी ब्रांड को ज्यादा पसंद करते हैं। सेवा की जगह मां-बाप की कमाई पर अपना हक समझते हैं। सच बोलने के बजाए वे कुछ भी बोलकर फायदा हासिल करना या मामले को निपटाना ही बेहतर समझते हैं। ऐसे में गांधी के विश्वासों में आस्था भला कहां दिखेगी?

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