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महिलाएं अधिकारों के प्रति सजग हों

सरकार महिलाओं को समर्थ बनाना चाहती है या कमजोर यह समझ से परे है। आखिर महिलाओं को कौन सा अधिकार सरकार दिलाना चाहती है? यह स्पष्ट नहीं है? क्या वास्तव में पीड़ित महिलाओं को इन कानूनी प्रावधानों का लाभ मिल पा रहा है? सच तो यह है कि सशक्तीकरण के नाम पर क्रियान्वित विभिन्न योजनाओं तथा कानूनों का लाभ सिर्फ समाज की प्रतिष्ठित तबके की महिलाओं ने ही उठाया है। यह भी एक प्रश्न है कि क्या नौकरियों, पंचायतों तथा संसद में महिलाओं को आरक्षण देकर उनका भला हो जाएगा। सच तो यह है कि सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण वंचित महिलाओं को कोई लाभ नहीं मिला है। कई बार तो कई चालाक महिलाएं कानूनी प्रावधानों का भी किसी के खिलाफ गलत इस्तेमाल करती हैं। जाहिर है महिलाओं को सरकार के राजनीतिक दांव पेच से बाहर निकलकर अपने अधिकारों के प्रति सजग होना पड़ेगा। समाज के समक्ष नारी को एक आदर्श रूप प्रस्तुत करना पड़ेगा। आज नारी को मानसिक और बौद्धिक रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है।
शंकर प्रसाद तिवारी, रुद्रप्रयाग

खिलाड़ियों का सम्मान करें
खेल और खिलाड़ी आज दोनों ही क्षेत्रों में हम तरक्की कर रहे है। चाहे बीजिंग ओलंपिक हो या राष्ट्रीय चैंपियनशिप। हर क्षेत्र और हर खेल में हम अच्छा कर रहे हैं, लेकिन खिलाड़ियों का अपमान समय-समय पर होता आया है। ये वही खिलाड़ी है, जिन्होंने पदक जीत कर भारत का नाम रोशन किया है। वर्तमान परिपेक्ष्य में अगर बात करें तो पहले उड़नपरी के नाम से विख्यात पी.टी. उषा का अपमान और फिर अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता पूर्व हॉकी खिलाड़ी एम. डुंगडुंग का अपमान किया गया है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो खिलाड़ी खेल छोड़ देंगे। देश के प्रत्येक नागरिक को खिलाड़ियों का सम्मान करना चाहिए, जिससे उनकी भावनाओं को बल मिल सके और वे देश के लिए और अधिक पदक जीत सकें।
प्रदीप सिंह, श्रीनगर गढ़वाल

भेदभाव वाली नीति दुर्भाग्यपूर्ण
भूतपूर्व सैनिकों के पक्ष में अंग्रेजों द्वारा विरासत में दी गई भेदभाव वाली नीति के तहत गुलामी के भ्रमजाल में हम अब तक फंसे हुए हैं। इसके ज्वलंत प्रमाण सीएसडी कैंटीन, मिलिट्री अस्पताल और सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास के कार्यालय आदि में आम देखे जा सकते हैं। अब भी उसी प्रकार का भेदभाव वाला व्यवहार जारी है। उत्तराखंड के देहरादून जैसे शहर में सीएसडी कैंटीन में र्दुव्यवस्था का आलम है। इससे उम्रदराज पूर्व सैनिकों के लिए सामान खरीदना समस्या का सबब है। एक ओर जहां लंबी कतार में धक्के खाने के बाद घंटों खड़े-खड़े इंतजार करना होता है । सीएम उसके संरक्षक एवं उपाध्यक्ष हैं, जबकि समाजकल्याण विभाग के मुख्य, प्रमुख सचिव सहित अन्य विभागों के सचिव इस परिषद के पदेन सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त राज्य में परिषद सैन्य अधिकारी जनरल, कर्नल तथा सेवानिवृत्त अधिकारियों सहित चंद विधायक भी इस परिषद के पदेन सदस्य हैं। इस संदर्भ में सरल नीति के तहत समस्या का निराकरण किया जा सकता है, किन्तु कोई भी अधिकारी इसे सुलझाने को आवश्यक नहीं समझता है और न ही गंभीर है। इससे ही पूर्व सैनिकों के कल्याण का अंदाजा लगाया जा सकता है।
खुशहाल सिंह बिष्ट, देहरादून

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