DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्राकृतिक संसाधनों पर हक न छोड़ेंगेः विकाशील देश

विकासशील देशों ने तय किया है कि, वह सभी मिलकर विकसित राष्ट्रों की पर्यावरणीय चिंताओं के प्रति सतर्क रहेंगे। यदि धनी राष्ट्रों ने पर्यावरण के नाम पर जल, जंगल, जमीन पर अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश नहीं छोड़ी तो वे उनका एक जुट होकर विरोध करेंगे। पर्यावरण के संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर बैंकाक में हुए विकासशील देशों के  सम्मेलन में कई अहम निर्णय लिए गए।

सम्मेलन में शिरकत कर लौटी सहारनपुर की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सामाजिक संगठन से जुड़ी रोमा ने ‘हिंदुस्तान’ को बताया कि कई मुल्कों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बैंकांक में  आंदोलन और संघर्ष की रणनीति तय की है। रोमा ने कहा कि असली मुद्दा यह है कि आजीविका के स्त्रोत जैसे, कृषि, भूमि, वन, समुद्र, खनिज, उर्जा के स्रोतों पर समुदायों का ही सामूहिक नियन्त्रण और अधिकार होना चाहिये।

उन्होंने कहा कि बैंकांक सम्मेलन में यह विचार सामने आया कि जन संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता अपने-अपने देशों में जो सामंतवाद, पूंजीवाद समर्थक तथा जनता विरोधी सरकारें हैं, उनके खिलाफ भी किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं को संघर्ष तेज करना होगा। नहीं तो ये सरकारें पूरी पृथ्वी को बेचने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी।

रोमा ने कहा कि कोपनहेगेन में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में समझौते करने के लिये कई ठोस निर्णय भी बैंकांक में लिये गये। उन्होंने कहा कि 37 विकसित राष्ट्र जैसे यूरोपीय देश, इंग्लैड, जर्मनी, फ्रांस आदि और जापान, जिन्होंने कार्बन उत्सर्जन की सीमा तय की हुयी थी। जिन्हें कानूनी तौर पर 2012 तक वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन को 16 प्रतिशत तक घटाना था। यह अवधि 2012 तक समाप्त हो जायेगी।

रोमा ने बताया कि बैंकांक में 177 देशों के करीब 4000 प्रतिनिधि मौजूद रहे। जिसमें सरकारी अधिकारी, पर्यावरणविद, ऊद्यमी एंव शौधकर्ता शामिल थे। वहां बड़े पैमाने पर मोर्चे निकाले गये और कई तरह के सम्मेलन आयोजित किये गये।

रोमा ने कहा कि एक तरफ राष्ट्रसंघ के तहत दुनियाभर के सरकारी नुमाइंदे, भविष्य में और भी पेचीदा होने वाले जलवायु परिवर्तन के संकट से उबरने के लिये मंथन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वहीं इनके विरोध में तमाम दुनिया के सामाजिक आंदोलन, ट्रेड यूनियन, मूलनिवासियों के संगठन, महिला संगठन, वन समुदायों के संगठन इस पूंजीवादी विकास और उससे उपजे आर्थिक संकट खास तौर पर आजीविका का संकट, रोजगार का संकट, भूख का संकट, किसानों की आत्महत्या, भूमि और जंगलों का निजीकरण जैसी विकट समस्याओं पर गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। गरीब मुल्कों की जनता आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भूख, किसानों की आत्म हत्या, भूमि और जंगलों के निजीकरण जैसी समस्याओं से परेशान हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्राकृतिक संसाधनों पर हक न छोड़ेंगेः विकाशील देश