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कलचुरियों ने बनाया था कड़ा किला

कड़ा के किले के बारे में पुरानी मान्यताओं के विपरीत इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के डॉ. डीपी दुबे ने दावा किया है कि इसे कलचुरी शासकों ने बनवाया था। अब तक माना जाता रहा है कि यह किला गहड़वाल शासक जयचंद का था। अपने शोधपत्र में डॉ. दुबे ने इस किले को 11वीं सदी के उत्तरार्ध में यहाँ शासन करने वाले कलचुरियों का बताया है।

उनका दावा है कि यह ऐतिहासिक स्थल कलचुरी कालीन कड़ा है। उनका मानना है कि 11वीं सदी में प्रतिहार नरेश यह किला महमूद गजनवी के हाथों हार गए थे। इसके बाद वह कन्नौज से भागकर सीतापुर जिले के सिधौली नसीराबाद चले गए। महमूद गजनवी के लौटने के बाद प्रतिहार नरेश की फिर वापसी हुई। यह वंश राजपाल के समय तक वहाँ का शासक रहा। बाद में चंदेलों की बढ़ती ताकत के कारण प्रतिहार राजा ने उजड़े कन्नौज क्षेत्र को छोड़कर कड़ा को राजधानी बना लिया।

11 वीं सदी के उत्तरार्ध में कलचुरी नरेश लक्ष्मीवर्ण के कौशाम्बी के समीप गोहरक गाँव से मिले दानपत्र में कर्णतीर्थ के लिए भूमिदान का पता चलता है। डॉ. डीपी दुबे का दावा है कि कलचुरी कालीन यह तीर्थ आधुनिक कड़ा ही है। यह दानपत्र एवं वहाँ से मिली मूर्तियों को इलाहाबाद संग्रहालय में आज भी सुरक्षित रखा गया है। 1857 के गदर में इस किले का ध्वंशावशेष क्रांतिकारियों की शरण स्थली बन गया था। इस कारण से अंग्रेजों ने इसे नष्ट कर दिया। किन्तु उनका बनाया वाच टावर किले के समीप आज भी खड़ा है।

आजादी के बाद कौशाम्बी में तो कई उत्खनन कार्य हुए परन्तु कड़ा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। हाल ही में कड़ा के किले के ध्वंशावशेषों के  संरक्षण का काम शुरू हुआ। इसी कड़ी में इविवि के डॉ. डीपी दुबे ने जब इस स्थान का सर्वे किया तो उन्हें  ऊपरी हिस्से में ही प्राचीर के अवशेष मिले। नीचे इसकी नींव भी दिखाई पड़ी। इसके साथ के अन्य भवन 13वीं से 15 वीं शताब्दी के भी मिलते हैं।

डॉ. दुबे ने दावा किया है कि यदि इस मध्यकालीन संस्कृति से जुड़े इस स्थल की खुदाई की जाए तो निश्चय ही यहाँ मौर्य, कुषाण एवं गुप्त काल के अवशेष प्राप्त होंगे। लोकमानस में यह किला आज भी अंतिम गहड़वाल शासक जयचंद के किले के नाम से प्रसिद्ध है। उसका शासन 1192 में चंदावर के युद्ध तक पता चलता है। उसकी पराजय के बाद गंगा घाटी में मुस्लिम शासकों का राज्य हो गया था। डॉ. दुबे चन्दावर के इस मैदान की पहचान शिकोहाबाद के पास यमुना तट को बताते हैं।

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