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न काटें वृक्षों को

न काटें वृक्षों को

भारत में जहां वर्ष के 6 महीने भयंकर गर्मी पड़ती है तो यह वृक्ष ही हैं जो हमें न केवल ठंडक पहुंचाते हैं, बल्कि पूरे वातावरण एवं पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। ऐसे में पेड़ लगाना आज की जरूरत है। पर अक्सर हम कहते हैं कि हमारे पास जगह नहीं है, या कम है। कहां व कैसे लगाएं? इतना ही नहीं, ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो सर्दियों में दूसरों की नजर बचाकर अपने घर के सामने आई टहनी या वृक्ष को काटकर उसे मुंड करने में जरा भी संकोच नहीं करते, क्योंकि यह उनके घर की धूप का एक अदद टुकड़ा रोक लेती है। यह बात अलग है कि ग्रीष्म में वह टहनी या वृक्ष उसी घर को शीतलता का अहसास कराती है।

आजकल कुछ लोग पर्दा करने की दृष्टि से पोलिएन्थस पेंडालुस जिसे अशोक कहते हैं, एक पंक्ति में लगा देते हैं। यह रिवाज भी हो गया है। क्या ही अच्छा हो, यदि हम इसके स्थान पर छोटे वृक्ष जसे बॉटल ब्रुश, मंदार, हरसिंगार, सावनी, गंधराज जसे वृक्ष लगाएं, जो सर्दियों में पत्ते झाड़ देते हैं व गर्मियों में खूब छाया व फूल दोनों ही देते हैं। चांदनी, गुडहल आदि फूलों वाली झड़ियां हैं, जो चाहने पर काफी ऊंची रखी ज सकती हैं और जब चाहें विशेषकर सर्दी में उन्हें काट कर छोटा भी कर सकते हैं। इसी प्रकार आप चाहें तो फाइक्स के अलग किस्म वाले पौधे परदे के लिए लगा सकते हैं और इच्छा होने पर उन्हें काट कर छोटा भी कर सकते हैं।

ये सब बताने का उद्देश्य है कि वृक्ष का उद्देश्य फूल व छाया दोनों होता है। इन छोटे वृक्षों में भी पक्षी अपना घोंसला बना सकते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से पक्षी बहुत महžवपूर्ण होते हैं। ये कीड़े- मकोड़ों को खाकर वातावरण शुद्ध रखते हैं। अत: वृक्ष ऐसे लगाए जने चाहिए , जिनमें पक्षी अपना घोंसला बना सकें। चहचहाते पक्षी तो आपको भी आह्लादित कर देंगे।

हरिद्वार के एक आश्रम ने वृक्ष-प्रेम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। खड़खड़ी स्थित निर्धन निकेतन आश्रम में भवन-विस्तार के समय आम के बहुत सारे पुराने वृक्ष बीच में आ गए तो उन्होंने पेड़ को काट कर निकालने के बजय नीचे से छांट कर छत के ऊपर निकाल दिया। अब उनका सभागार कंक्रीट के खम्बों पर ही नहीं, बल्कि बहुत से आम के तनों पर टिका मालूम होता है। छत के बीच से ऊपर निकले वृक्ष देखने में भी अत्यन्त भव्य लगते हैं। छत के ऊपर ये वृक्ष छतनार से फैले ऋतु आने पर फल तो देते ही हैं, साथ ही पक्षियों की चहचहाहट से गूंजते भी रहते हैं। ये वास्तव में आश्रम के व्यवस्थापकों के वृक्ष-प्रेम व पर्यावरण के प्रति सजगता की ओर संकेत ही नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक सुन्दर उदाहरण है।

बागवानी का अर्थ केवल सुन्दर पौधों द्वारा बाग को सज्जित करना नहीं, बल्कि अपने वातावरण, पर्यावरण के प्रति सजग रहना भी है। घर में स्थान नहीं तो बाहर लगाइए। लगाइए ही नहीं, उनके बचाव का प्रयत्न भी कीजिए। जिस प्रकार हम संतान की सुरक्षा करते हैं, वृक्ष का भी संरक्षण कीजिए। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए उसे काटिए नहीं।

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