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स्वस्थ रहना है तो सिखाइए दिमाग को भी सबक

स्वस्थ रहना है तो सिखाइए दिमाग को भी सबक

कहते हैं कि दिमाग के विकास के बिना मनुष्य के शरीर के विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाता, लिहाजा विशेषज्ञों के अनुसार व्यक्तित्व के विकास के लिए हमें अपने मस्तिष्क को सिखाने के लिए हमेशा नए-नए लक्ष्य सुझाते रहना चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार बचपन में तेज विकास इसलिए होता है, क्योंकि बच्चा तेजी से सीखता है, जबकि सीखने की गति कम होने का मतलब है उम्रदराज होना। अगर कोई व्यक्ति अपने सीखने के क्रम को लगातार जारी रखता है तो वह काफी हद तक उम्र के प्रभाव को कम कर सकता है।

मनोचिकित्सक डॉ. रचना सिंह के अनुसार मानव मस्तिष्क हर समय कुछ न कुछ सीख सकता है। सीखने के जरिए ही मनुष्य की सतर्कता बढ़ाई जाती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर मनुष्य के सीखने का तरीका अलग-अलग होता है। आप किसी एक तरीके या पद्धति से हर व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रशिक्षित नहीं कर सकते।

उनके मुताबिक कई व्यक्तियों को मानसिक विकार होने का एक बड़ा कारण यह होता है कि वे अपने मस्तिष्क को किसी खास परिस्थिति के अनुरूप नहीं ढाल पाते। मिसाल के तौर पर कुछ लोग पारिवारिक, सामाजिक या अन्य बदलाव होने पर परेशान हो जाते हैं। ऐसे लोगों ने अपने मस्तिष्क को इस बात के लिए प्रशिक्षित नहीं किया होता कि बदलाव के साथ कैसे सामंजस्य बिठाया जाए।

डॉ. रचना ने कहा कि मनोविकारों से ग्रस्त व्यक्तियों के उपचार में अन्य पद्धतियों के साथ-साथ इस बात पर विशेष ध्यान रखा जाता है कि चिकित्सक उन्हें जो निर्देश दे रहे हैं, रोगी का मस्तिष्क उन्हें ग्रहण कर रहा है या नहीं। उन्होंने कहा कि अगर रोगी का दिमाग इस तरह के निर्देशों से अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना शुरू कर देता है तो निश्चित तौर पर इसे काफी अच्छी पहल माना जाता है।

उपचार में मस्तिष्क के प्रशिक्षण के लिए व्यक्ति के आधार पर पद्धति तय की जाती है और इसके लिए कोई एक सामान्य पद्धति नहीं होती। आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़ी संगीता आनंद के अनुसार मनुष्य का दिमाग तभी एकाग्र, अनुशासित, प्रशिक्षित हो सकता है जब वह शांत और निश्चल हो। दिमाग की शांति बहुत हद तक उसकी सांस लेने की गति पर निर्भर करती है। आदमी जब परेशान, क्रोधित या उत्तेजित होता है तो उसकी सांसों की रफ्तार तेज हो जाती है।

उन्होंने कहा कि आज की जीवनशैली में लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह एक बंधे-बंधाये ढर्रे और शैली में जीने के आदी हो गए हैं। ऐसे में उनके दिमाग को कोई भी नया विचार अपनाने में काफी कठिनाई आती है।

संगीता आनंद ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हम जीवन के छोटे-छोटे नियमों को नहीं जानते हों, लेकिन हमने अपने मन को इनके लिए प्रशिक्षित नहीं किया है, जिसके कारण हमें आज कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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