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खेल-खेल में पढ़ाएंगे तो अव्वल नबंर आएंगे

खेल-खेल में पढ़ाएंगे तो अव्वल नबंर आएंगे

रजनीश को आफिस से घर आने में विलंब हो गया। उसके पिता ने कारण पूछा तो उसने बताया कि कुछ मित्रों के साथ चाय-पानी पर बैठ गया था। पिता ने ताकीद की कि या तो घर आने के बाद जया करो या फिर सूचना दे दिया करो। रजनीश ने उनसे जी कहकर उनकी बात मान ली। करीब 20 मिनट बाद सब लोग खाने के लिए साथ बैठ गए। रजनीश खुद दो बच्चों का पिता है। दोनों स्कूल जते हैं। बच्चों के दादा यानी रजनीश के पिता सेवानिवृत्त हैं। घर में अनुशासन बनाये रखने की उनकी जिम्मेदारी है। खाते समय रजनीश ने बच्चों की दिनभर की गतिविधियों के बारे में कुछ पूछा। रजनीश के घर में अक्सर यह होता है। अपने पिता की वह सुनता है। बच्चे दादा-दादी संग घुमन-फिरने जाते हैं। बच्चे देखते हैं कि पापा के पापा और मम्मी किस तरह घर में व्यवस्था बनाते हैं। उधर, हेमंत भी संयुक्त परिवार में रहता है, लेकिन उसके घर में कलह बहुत होती है। बच्चो की कई आदतें बिगड़ गई हैं। परिवार में इसके लिए एक दूसरे पर सब दोष मढ़ रहे हैं। मुकेश, लोकेश, सुरेन्द्र कई घर ऐसे हैं, जहां परिवार संयुक्त है।
कुछ बच्चे सिर्फ अपने मम्मी-पापा के साथ रहते हैं। उनमें से कुछ को यह बात सालती है कि दादा-दादी उनके साथ क्यों नहीं रहते, जबकि कुछ ने इस तरफ शायद सोचा ही नहीं क्योंकि उन्हें माहौल नहीं मिला।

इस तरह के तमाम भारतीय परिवारों के बच्चों पर हाल ही में एक शोध किया गया। शोध खासतौर पर शहरी परिवारों के बीच किया गया। शोध में अध्ययनकर्ताओं ने एक बात पर खास ध्यान दिया कि कई घरों में दादाजी ने पापा को डांटा और बच्च देखता रहा यानी उसके पापा पर भी  किसी की नजर है। इसी तरह दादी भी मम्मी-पापा को डांटती हैं और उनके लिए चिंता भी करती हैं। शोधकर्ताओं ने जो निष्कर्ष निकाला उसके मुताबिक दादा-दादी और मां-बाप के बीच का समन्वय बच्चों पर बिल्कुल भी गलत प्रभाव नहीं डालती, बल्कि एक दूसरे के प्रति समर्पण और एक दूसरे का ख्याल रखने का बोध बच्चों को होता है। बाल मनोविज्ञान पर शोध करने वालों ने यह ताकीद की है कि एकाकी परिवार में कई परेशानियां हैं। ऐसे बच्चों में मानवीय मूल्य नहीं पनप पाते हैं। शोधकर्ताओं ने कुछ बातें नोट की, मसलन कुछ घरों में बच्चों को दादा-दादी से बेहद प्यार मिलता है और मां-बाप मानते हैं कि बच्चे इसी वजह से बिगड़ रहे हैं। इसी सोच के चलते वे दादा-दादी से बच्चों की दूरी बढ़ा देते हैं।

शोध का निष्कर्ष
जिन घरों में दादा-दादी को पूरी तवज्जो दी जाती है और वे जिम्मेदारी पूर्वक बच्चों की देखभाल करते हैं वहां के बच्चों में अन्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा मानवीय मूल्य और संस्कार आते हैं।  एकाकी घरों के बच्चों जिद्दी और चीजों को शेयर नहीं करने वाले बन जाते हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि घर के किसी कलह में अगर दादा या दादी जज की भूमिका में आते हैं तो बच्च एक व्यवस्था सीखता है। ऐसा ही उसे स्कूल में भी नजर आता है। वह देखता है प्रिसिंपल की कंमाड अध्यापकों पर होती है और अध्यापकों की बच्चों पर। उसके दिमाग में यह बात घर कर जती है कि यह व्यवस्था ऐसे ही चलती है। इसके उलट जब घर में बड़ों को अलग रखा जाता है तो बच्च घर और स्कूली व्यवस्था में फर्क महसूस करता है। उसे अपने अंदर द्वंद्व नजर आता है, यही विस्फोटक होता है। 

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