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दीवाली आई, व्यस्त हुई गृहलक्ष्मी

दीवाली आई, व्यस्त हुई गृहलक्ष्मी

कामकाजी महिलाएं
सरकारी नौकरी करने वाली दीपिका अनेक काम तो आफिस से आते-जाते निपटा रही हैं, मसलन सजने वाली लड़ियां, कागजी फूलों की मालाएं बच्चों के लिए कुछ सामान। दीपिका कहती हैं उनके आफिस के आसपास कुछ दुकानें ऐसी हैं, जहां कई किस्म के घरेलू सामान ठीक और उचित दाम पर मिल जते हैं। दीपिका की ही तरह रोशनी, मीता और नीरा भी आते जाते कुछ सामान ले आती हैं। हालांकि नीरा कहती हैं कि त्योहार की खरीदारी के लिए वह छुट्टी ले लेती हैं। उनके पति रमेश को भी इसके लिए एक या दो दिन छुट्टी लेनी पड़ती है। दीवाली की तैयारी कैसे करती हैं? इसपर मोहिनी कहती हैं कि शहरी जीवन में ज्यादा समय कहां है लेकिन एक या दो दिन की खुशी के लिए भले बहुत समय लगाना पड़ जए वे इस मौके को मिस नहीं करना चाहते। इन सबसे इतर मल्टी नेशनल कंपनी में काम करने वाली रोहिणी कहती हैं की वह अखबारों या अन्य माध्यमों से हमेशा यह देखती रहती हैं कि त्योहारी मौसम में कहां-कहां और क्या-क्या छूट और ऑफर मिल रहे हैं। क्या ऑफर से कोई फायदा मिलता है, रीना का इस पर एकदम अलग तर्क है, रीना कहती हैं छूट तो मिलती ही है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि त्योहार पर कुछ भी बतौर गिफ्ट या छूट के साथ मिल जाता है तो उसका मजा ही अलग है।

गृहणियों की तैयारी
सोनाली यद्यपि घरेलू महिला हैं, लेकिन त्योहार पर खरीदारी हो या फिर घर की सजवट का मामला, उनकी तैयारी किसी से कम नहीं है। वहीं मोहिता का तर्क देखिए-यदि हम कहीं जॉब नहीं करते तो क्या, पढ़ा-लिखा होने का इतना तो फर्क होना चाहिए कि हम कुछ काम ऐसे करें कि त्योहार का मज दोगुना हो जए। दीवाली पर कहां जएंगी पूछने पर शालिनी कहती हैं, कहीं जना नहीं है। घर में त्योहार मनाएंगे शाम को आसपास के लोगों से मिलेंगे।

परंपराओं को जिंदा रखने की हसरत
छोटे-छोटे बल्बों से सजी लड़ियों ने भले सारा आकर्षण अपनी तरफ कर लिया हो, लेकिन परंपराओं को जिंदा रखने की हसरत सबके मन में है। कामकाजी महिलाएं हों या फिर घर का कामकाज संभालने वाली गृहिणी, सबका कहना एक ही है कि दीए तो लेंगे ही। जब इतने सस्ते में मालाएं आ गई हैं तो दीए जरूरी हैं क्या? पूछने पर सबका एक ही जवाब रहता है दीए की बात ही कुछ और है। गीता कहती हैं कि हमारे घर में तो हर दीवाली पर कम से कम 50 दीए जलते ही हैं। दीपिका मानती हैं कि दीयों की संख्या कम तो हो गई है, लेकिन अहमियत कम नहीं हुई। दीए बेचने वाले कुछ लोगों से बात की गई तो उनका कहना था कि अब उस अनुपात में तो दीए नहीं बिकते, लेकिन दीवाली की खरीदारी करने आया हर व्यक्ति कुछ न कुछ दीए लेता जरूर है। हां यह जरूर है कि दीयों में भी अब डिजइनर की लड़ाई हो जाने के कारण सामान्य दीयों के मकाबले ये डिजइनर दीए ज्यादा बिकते हैं।

ताजे पुष्प जरूर चाहिए
कागजों और प्लास्टिक के भले ही एक से बढ़कर एक मोहक पुष्प बाजर में उपलब्ध हों, लेकिन अनेक घरों में महिलाएं छोटी और बड़ी दीवाली को ताजे पुष्प का इंतजम करती हैं। घर के बाहर गेंदे के फूल लगाने का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि जिस तरह गेंदे का पुष्प भरापूरा होता है उसी तरह घर के दरवाजे पर पुष्प लगाने से समृद्धि रहती है। पूज-पाठ के लिए इस दिन पुष्प खरीदे जते हैं। कुछ घरों में कई महीने पहले से ही पुष्प उगा दिए जाते हैं।

रंगोली और अल्पना का खास महत्वकुछ इलाकों में दीवाली के दिन रंगोली और अल्पना बनाने का विशेष महत्व है। राप्ती कहती हैं कि उनके घर में बड़े बुजरुग हैं जिनके चलते उन्हें घर सजने में खासी मदद मिल जती है। अदिति के यहां रिवाज है लक्ष्मी के पैर बनाने और घर की देहली में खूबसूरत अल्पना बनाने का। अदिति कहती हैं इस बार उन्होंने नया घर लिया है, इसलिए इस बार पेंट से बाकायदा अल्पना और लक्ष्मी के पैर बनाने की योजना है ताकि एक दो साल तक ये बने रहें। साक्षी कहती हैं कि उनके यहां गेरू का काम हर हालत में किया जाता है। वह इसका वज्ञानिक महत्व भी बताती हैं कि गमलों, घर के कोनों में और मंदिर आदि में गेरू लगाने से कीड़े-मकौड़े नहीं लगते। सजवट की यह जिम्मेदारी सामान्यत: महिलाओं पर ही होती है। कुछ घरों में बच्चे भी इस काम में लगे रहते हैं, लेकिन ये सब काम होते महिलाओं के ही नेतृत्व में है।

नया ट्रेंड
शहरों में एकल परिवारो का नया ट्रेंड सामने आया है। दीवाली से एक दिन पहले या उसी दिन ऐसे परिवार माल्स में दिख जते हैं। अनेक शोरूम और माल्स ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इन दिनों तरह -तरह की प्रतियोगिता रखते हैं। यह प्रतियोगिता दीवाली से संबंधित सवालों से लेकर,गीत-संगीत और खान-पान तक की होती है।

व्रत भी रखती हैं अनेक महिलाएं
दीवाली पर साज-सजावट से लेकर खान-पान बनाने में व्यस्त रहने वाली महिलाओं में से अनेक लक्ष्मी पूजन वाले दिन व्रत भी रखती हैं। अनेक स्थानों पर मान्यता है कि लक्ष्मी पूजन के दिन व्रत रखने से घर में सुख समृद्धि आती है। दिनभर महिलाएं व्रत करती हैं। शाम को पूज के बाद व्रत खोला जाता है। व्रत खोलने से पहले कुछ स्थानों पर प्रसाद बांटने का भी रिवाज है।

बेटा रसोई में न बैठे तो दीवाली नहीं लगती
तमाम परिवार ऐसे हैं जहां बेटा या बेटी कामकाज के सिलसिले में बाहर होते हैं। दीवाली पर घरवालों को उनके आने की प्रतीक्षा रहती है। आगरा के रामनरेश मित्तल व उनकी पत्नी उषा ने दिल्ली की मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे बेटे मधुर को खास हिदायत दे रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए और चाहे नौकरी ही क्यों न छोड़नी पड़े दीवाली पर तुम्हें घर जरूर आना है। मधुर की मां उषा बेटे की पसंदीदा काजू बर्फी बनाने में जुटी हैं। उषा कहती हैं- जब तक बेटा रसोई में बैठकर अपनी मनपसंद पूड़ी, आलू की सब्जी और दही नहीं खा लेता, मेरी तो दीवाली अधूरी ही रहती है। इसके अलावा वह नाश्ते में मेरे हाथ के बने पराठे ही पसंद करता है।

दीवाली पर लक्ष्मी पूजन की तैयारी में घर की लक्ष्मी की व्यस्तता बढ़ गई है। यह व्यस्तता देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से अलग-अलग है। कहीं दीवाली की तैयारियों का अंदाज ही एकदम मॉल कल्चर वाला है, कहीं परपंराओं को जिंदा रखने की जद्दोजहद है और कहीं इन सबके बीच सामंजस्य बिठाने की तैयारी है।

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