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दो टूक (12 अक्तूबर, 2009)

दीपावली की दस्तक के साथ नक्कालों ने भी लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियां शुरू कर दी हैं। जगह-जगह से नकली मावा आदि पकड़े जाने की खबरें हैं। गरीबी में गुजर कर रही देश की आधी से ज्यादा आबादी सस्ते माल का बाजार बनाती है। बाजारू संस्कृति उसे भी लुभाती है। गरीब बच्चे भी मौज-मस्ती के ख्वाब देखते हैं। लेकिन आसमान छूती कीमतों के बीच असली माल खरीद पाना उनकी हैसियत के बाहर है।

बाजार और व्यवस्था के बीच बन चुके विशाल अंतराल में नकली माल का असली कारोबार होता है। इसलिए धरपकड़ या मुस्तैदी से इसके खात्मे का वहम नहीं पालना चाहिए। भारत के शिखर में उग रहे संपन्नता के सूर्य की किरणें अगर तलहटी तक नहीं पहुंचेंगी तो नकली उजाले की लालटेनों को बुझाया नहीं जा सकेगा। चकाचौंध भला किसे अच्छी नहीं लगती!

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  • Web Title:दो टूक (12 अक्तूबर, 2009)