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इस जहाज के पंछी का उस जहाज में जाना

हमने जब वादि-ए-ग़ुरबत में कदम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
वहीद इलाहाबादी के इस शेर में अपनी ज़मीन से दूर जाने वाले का रंज़ छिपा है। कोई अपना घर क्यों छोड़ता है? फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ कलकत्ता में रिक्शा खींचने को मज़बूर हुए किसान की कहानी है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रचलित बिदेसिया गीत रोज़ी की तलाश में परदेस गए लोगों की याद में गाए जाते हैं। किसी भी सुबह दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता या अब बेंगलुरू के रेलवे स्टेशन पर जाएं तो सैकड़ों लोग सिर पर गठरियाँ रखे उतरते नज़र आएंगे।

विस्थापन या पलायन हाल की कहानी नहीं है। हाल में वैश्वीकरण और अर्थव्यवस्था में बदलाव के बाद भारत और चीन जैसे देशों में ग्रामीण आबादी तेजी से उन शहरों की ओर जा रही है, जहाँ रोज़गार की बेहतर सम्भावनाएं हैं। पर पलायन मनुष्य के भाग्य में हजारों साल पहले लिख दिया गया था। डीएनए टेस्ट और जीवाश्म अध्ययनों से पता लगता है कि मनुष्य का प्रारम्भिक निवास अफ्रीका का भूमध्यरेखीय इलाका था। करीब पचास हजार साल पहले इंसान लाल सागर पार करके दक्षिण अरब क्षेत्र तक आया। फिर भारत होता हुआ दुनिया के दूसरे इलाकों में फैलता गया। कहीं जाकर बसना मनुष्य के बुनियादी अधिकारों में से एक है। 1948 में संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणापत्र के तेरहवें अनुच्छेद में इसकी पुष्टि की गई है।

भारतीय परम्परा में अतिथि देवता है। हमारा समाज परम्परा से बेहद गतिशील है। खासकर धार्मिक यात्राओं के कारण। सॉक्रेटीस ने कहा था, जो हमारे नगर राज्य में नहीं रहना चाहता और किसी दूसरी जगह जाकर रहना चाहता है, तो यह उसका अधिकार है। सन 1215 में इंग्लैंड के मैग्नाकार्टा में व्यक्ति के इस अधिकार की पुष्टि की गई थी।

विस्थापन या पलायन एक अधिकार है, समस्या भी और समाधान भी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम इस साल की मानव अधिकार रिपोर्ट मानवीय गतिशीलता और विकास पर केन्द्रित है। इस रोचक पहलू पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। ध्यान गया भी है तो इसे समस्या के रूप में देखा गया है। युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण विस्थापन हमारा ध्यान खींचता है।

चीन और भारत जैसे देशों में पिछले दो दशक में करोड़ों लोग खेती-बारी से जुड़े अपने परम्परागत काम को छोड़कर औद्योगिक शहरों में आए हैं। इससे उनके जीवन स्तर में बदलाव आया है। वे पैसा अपने घर भेजने लगे हैं, जिससे उनके घर में भी बदलाव आया है। हाल में मंदी के कारण जब रोजगार कम हुए तो उनकी घर वापसी एक समस्या के रूप में सामने आई। यानी जो विस्थापन हुआ है, वह स्थायी है। गाँव और शहर का नक्शा बदल रहा है।

समूची दुनिया का विकास समान नहीं है। कुछ खास इलाके ज्यादा विकसित हैं और कुछ कम। या तो कम विकसित इलाकों तक विकास जाए, वर्ना कम विकसित लोग किसी न किसी तरह विकसित इलाकों में पहुँचेंगे। विडंबना है कि देश के काफी बड़े इलाके में ‘माटी-माय छोड़ब नहीं’ का संग्राम है और उसी इलाके को छोड़कर लोग रोज़गार की तलाश में जा रहे हैं।

यूएनडीपी की रिपोर्ट में ऐसे अनेक अध्ययनों का ज़िक्र है, जिनसे पता लगता है कि इस पलायन का मानवीय विकास से रिश्ता है। जो छोड़कर नहीं गए वे पिछड़े रह गए। गो कि यह इतना सरल नहीं कि इसे विकास का मंत्र मान लिया जाय, पर सच यह है कि आज दुनिया के सबसे विकसित इलाके बाहर से आए लोगों से भरे हैं। जैसे अमेरिका।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोप से अमेरिका आने वाले लोगों की संख्या एक साल में दस लाख के आसपास थी। आयरलैंड की 14, नॉर्वे की 10, इंग्लैंड और स्विट्ज़रलैंड की सात-सात फीसदी आबादी अमेरिका पहुँच गई। उसी दौरान किराया-भाड़ा काफी कम हुआ और हालात ऐसे बने की पलायन बढ़ता ही गया। पर आज यह स्थिति नहीं है। एक दौर में बाहर से आने वालों का स्वागत था। आज तो उन्हें रोकने के नियम हैं। रेल यात्रियों की तरह जिन्हें सीट मिल गई वे दूसरों को जगह देना नहीं चाहते।

पलायन और विस्थापन एक ही देश के अंदर जितना ज्यादा है, उतना अंतरराष्ट्रीय नहीं है। इसकी एक वजह किराया-भाड़ा है और दूसरी पाबंदियाँ। यूएनडीपी का अनुमान है कि इस वक्त दुनिया में हर साल करीब 74 करोड़ लोग अपने घर छोड़कर अपने ही दोश में कहीं जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा परा करके जाने वालों की संख्या करीब 21 करोड़ है। गाँव से पास के शहर या कुछ दूर राजधानी तक पहुँचना आसान है।

पलायन से पहले यह देखना होता है कि वहाँ भाषा, संस्कृति, धर्म, खान-पान वगैरह कैसा है। फिर यह भी कि अपने लोग हैं या नहीं। दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज़ तक गए भारतीय लोगों ने अपनी संस्कृति को आजतक बचाकर रखा है। वैश्वीकरण की मानवीय लहरें कुछ बुनियादी बातों की ओर ध्यान खींचती हैं। सांस्कृतिक विलयन और टकराव साथ-साथ चलता है। अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के सवाल खड़े होते हैं। जैसे महाराष्ट्र में बिहारियों के प्रति कटुता पैदा की गई वैसा दुनिया के दूसरे इलाकों में भी होता है।

औद्योगीकरण से शहरीकरण बढ़ा। दुनिया के शहरों में रहने वाले लोगों में से एक तिहाई झुग्गियों में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर विस्थापित हैं। फिर भी विस्थापन बहुत से लोगों के जीवन स्तर को सुधार रहा है। यह वैश्विक एकीकरण के लिए भी उपयोगी है। आने वाले दशक में अमेरिका की जनसंख्या में भारतीय मूल के लोगों की संख्या आज से बेहतर होगी। वह आबादी अमेरिकी मनोदशा को बदलेगी, भारतीय चेतना को भी। इस लिहाज से विस्थापन एक सकारात्मक गतिविधि है। खासतौर से यदि यह स्वेच्छा से है, मजबूरी में नहीं। यह भी ध्यान दें कि विकसित समाजों में विस्थापन ज्यादा है, अविकसित समाजों में कम। तब हमें विस्थापन का गम्भीरता से अध्ययन करना चाहिए और नीति के स्तर पर बदलाव करने चाहिए।

दिल्ली-मुम्बई या न्यूयॉर्क के लोगों को बाहर से आए लोगों को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने के बजाय उन्हें रास्ता देना चाहिए। आखिर आपके पूर्वज भी तो कहीं से यहाँ आए थे। शहरी विकास के बेहतर मॉडल बनाए जाने चाहिए। हमारा आर्थिक विकास होगा, तो बाहर से लोग आएंगे। कुछ को तो हम ही बुलाएंगे। अच्छे आर्किटेक्ट, कलाकार, तकनीशियन, दस्तकार सब हमें चाहिए। आज हम पश्चिम की और भाग रहे हैं। कौन जाने कल हम पश्चिमी लोगों को नौकरी दें। हम विश्व को एक समुदाय, एक नीड़ मानते हैं, जिसमें अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और जीवन शैलियों का संगम है। इसे हम बेहतर शक्ल देने के बारे में क्यों न सोचें।

pjoshi @hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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