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उर्दू मीडिया : तस्वीर बदलने का डर

मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने मुस्लिम सांसदों के बीच केंद्रीय मदरसा बोर्ड के गठन का मसौदा क्या पेश किया, उलेमा का एक बड़ा तबका भड़का हुआ है। उसने नवंबर के दूसरे सप्ताह में संसद का घेराव करने की चेतावनी दी है। मुस्लिम और इस्लामी तंजीमों के मुखिया सिब्बल से मिलकर विरोध भी जता आए हैं। प्रधामनमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को भी चिट्ठी लिखकर ऐसा न करने की अपील की गई है। हालाकि, केंद्रीय मरदसा बोर्ड के गठन की मांग काफी पुरानी है। 2007 में जस्टिस एम.एस.ए. सिद्दीकी ने इस बारे में सुझाव दिए थे। 

इसके हिमायतियों का तर्क है कि बोर्ड के गठन से मदरसे की तालीम को सरकारी मान्यता मिलेगी। इससे दीनी तालीम के साथ जदीद इल्म हासिल करने वाले अपना भविष्य संवार सकेंगे। केंद्र में यूपीए के दोबारा सत्ता में आने पर विभिन्न मंचों से फिर बोर्ड के गठन का शोर उठा। इसे गंभीरता से लेते हुए सिब्बल ने चंद रोज पहले इसकी पहल की। इस मुद्दे पर मुस्लिम जगत और उर्दू मीडिया दो धड़ों में बंट गया है।

विरोधी खेमा किस कदर बिफरा हुआ है, इसकी बानगी में कुछ शीर्षक-‘इस्लामी शनाख्त खत्म करने की कोशिश कामयाब नहीं होगी’, ‘मदरसा बोर्ड की नहीं मदरसा जदीदकारी कमेटी की सिफारिशों पर अमल जरुरी’, ‘मरकजी मदरसा बोर्ड का मसवदा एक जुबान से खारिज’, ‘कपिल सिब्बल का सलसानी फार्मूला’, ‘शनाख्त सलिब करने की मनज्जम साजिश का हिस्सा’। ये खबरें निरंतर नाराजगी जता रही हैं। वैसे, उलेमा का एक तबका ऐसा भी है, जो मदरसों की दुर्दशा के लिए लंबे समय से कौम की मिल्कियत पर कुंडली मारे बैठे लोगों को जिम्मेदार ठहराता है।

चंद मदरसों को छोड़ दें तो ज्यादातर मदरसे आम मुस्लिमों से कट गए हैं। मौलाना नदीमुलवाजदी ‘सहाफत’ में ‘कुछ दीनी बातें मदरसों के जिम्मेदारों से’ में कहते हैं-बड़े मदरसे क्या, अब तो छोटे मदरसे भी कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, सऊदी मुल्कों से चंदा बटोरने की ताक में रहते हैं। पहले मदरसे फितरा, जकात पर निर्भर थे। इसलिए अवाम से जुड़े हुए थे। अब मदरसे की बढ़ती आमदनी के चलते उनके संचालकों के मन में मैल आ गया है। कई मौलवियों ने पुराने मदरसे से रिश्ता तोड़कर नया मदरसा कायम कर लिया है। सिर्फ यूपी में हाल के दिनों में बारह मदरसे कायम किए गए। कुछ मदरसा संचालकों ने मदरसे की मिलकियत अपने बच्चाों के नाम रजिस्टरी करवा ली है।

तटस्थ आलिम केंद्रीय मदरसा बोर्ड को लेकर अलग राय रखते हैं। उन्हें लगता है कि सरकारी निजाम के तहत आने से मदरसे का मूल स्वरुप और मिजाज बदल जाएगा। ‘हमारा समाज’ में खुर्शीद आलम ‘मर्कजी मदरसा: बोर्ड सिम्त रफ्तार और राह के मसायल’ में कहते हैं, ‘मसौदे के चैप्टर चार में गैर इस्लामी मजहब की पढ़ाई के बारे में तो बताया गया। उसमें कुराआन, हदीस, दीनी तालीम का जिक्र नहीं है।’ मसौदे के मुताबिक, बोर्ड संचालन का जिम्मा एक कमेटी संभालेगी।

इसमें एक चेयरमैन व बरेलवी, अहले हदीस, इमाम शाफी, शिया, दाउदी बोहरा फिरके के सदस्यों के अलावा समाज विज्ञान, मानव विज्ञान और वोकेनशनल ट्रेनिंग के माहिर भी होंगे। दो सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी। सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं- अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया इस्लामिया को केंद्रीय यूनिवर्सिटी का दर्ज देने का हश्र हम देख चुके। सर सैयद अहमद खां और डॉ. जाकिर व आबिद हुसैन ने जिस मंशा से इनकी स्थापना की थी। वह बरकरार नहीं रह पाई। एक अखबार मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सदर ओवैसी के हवाले से कहता है कि सरकार मसौदे के दफा 38 के तहत मदरसों पर अपनी पकड़ बनाना चाहती है।

केंद्रीय मदरसा बोर्ड के गठन के बाद मिस्र, अलज्ज़ायर, तुर्की के मदरसों की तरह हमारे मदरसे भी बदहाली का शिकार हो जाएंगे। बोर्ड बनने पर स्कूल एक्जाम बोर्ड की खामियां इसमें भी आ जाएंगी। ‘जदीद खबर’ में मदरसा जदीदकारी कमेटी के चेयरमैन और खानकाह मुंगेर के सज्जादानशीं वली रहमानी ने भी मुखालफत की है।

भाजपा सांसद शाहनवाज हुसैन भी बोर्ड के गठन से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है। मानव संसाधन मंत्रलय को मुसलमानों के हक में ठोस कुछ करना ही है। तीन-चार फीसदी की फिक्र छोड़कर 96 परसेंट पिछड़े मुसलमानों की सुध लें। एक अखबार ‘वक्फ इम्लाक मुसलमानों की तकदीर बदल सकती है’ में कहता है-मुल्क में वक्फ की सात लाख एकड़ जमीन से महीने में तकरीबन 25 करोड़ रुपये आमदनी होती है। 1908 के बाद से अब तक के वक्फ रेवेन्यू और देश बंटवारे के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों की जमीन-जायदाद का रिकार्ड दुरुस्त कर, इससे होने वाली आमदनी मुसलमानों पर खर्च की जाए तो किसी मदरसा बोर्ड और सरकारी मदद की जरूरत नहीं।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64 @ yahoo. com

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