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बुद्धिवाद का मसीहा

स्पिनोजा की ख्याति लोकोत्तरवाद और धर्म-रूढ़िवाद का साफ शब्दों में खंडन करने और बुद्धिवाद व प्रकृतिवाद के जबर्दस्त पैरोकार के तौर पर है। ऐसा करने वाले वे पहले दार्शनिक समझे जाते हैं। अपने विचारों की उन्होंने कीमत भी चुकाई। धर्मविरोधी विचारों के कारण उन्हें अपना शहर एम्सटरडर्म छोड़ना पड़ा और कई जगहों पर धक्के खाते हुए वे प्राग पहुंचे।

प्राग में उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए पत्थरों की घिसाई का काम किया। स्पिनोजा का जन्म 1632 में हॉलैंड के एक यहूदी परिवार में हुआ था। अपने पूरे जीवनकाल में उन्हें यहूदी और ईसाई कठमुल्लाओं की घृणा झेलनी पड़ी। वे महान विचारक थे, पर अपने दौर में उनकी पहचान केवल एक नास्तिक के तौर पर थी। उनके जीवन पर अधिक प्रभाव महान फ्रेंच दार्शनिक देकार्त का था।

स्पिनोजा के हर्फ-हर्फ कोरी आस्तिकता की खिल्ली उड़ाते थे। उन्होंने हर तरह के धर्मग्रंथ और शास्त्र के प्रमाण से बुद्धि के प्रमाण को विश्वसनीय कहा। उनका कहना था कि धर्मग्रंथों को सच्चा तभी कहा जाना चाहिए, जब वह बुद्धि की कसौटी पर खरे उतरते हों। धर्मग्रंथों के साथ भी वे वैसा ही रवैया रखने के पक्षधर थे जैसा ऐतिहासिक ग्रंथों और लेखों के साथ रखा जाता है। बुद्धि के बारे में उन्होंने कहा कि इसका काम यह जानना है कि भिन्न-भिन्न वस्तुओं में क्या संबंध है।

स्पिनोजा ने व्याख्या दी कि हर प्राकृतिक घटनाओं में संबद्धता है और अगर उनकी व्याख्या के लिए प्रकृति से परे किसी लोकोत्तर चीज को लाई जाए तो वस्तुओं का आंतरिक संबंध विच्छिन्न हो जाता है और ऐसे में सत्य तक पहुंचने का जो जरिया हमारे पास था उसे ही हम खो देंगे। स्पिनोजा का विचार था कि कोई भी वस्तु अपनी सत्ता के लिए दूसरे अनगिनत तत्वों पर और इन आधारभूत तत्वों में से भी प्रत्येक दूसरे अनगिनत तत्वों पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि उद्वेगों को समझना, उन्हें आनंद और प्रेम के शासन में करना यही मनुष्य का लक्ष्य है और इसी को ईश्वरीय प्रेम कहते हैं।

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