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शहर के बुद्धिजीवी

अपन इतिहास के विद्यार्थी नहीं हैं। लिहाजा प्रामाणिक तौर पर हम दावा करने में असमर्थ हैं कि पाषाण युग के संघर्षशील इंसानों में बुद्धिजीवी होते थे कि नहीं। यों पथरीले मैदानों में भी कैक्टस ठाठ से उगता है। नाजुक, छुई-मुई सी कन्याओं में से कई के शरीर आभूषण और दिल में पत्थर जड़े हैं। कई कामयाब जनसेवकों के हृदय होने की अप्रत्याशित खबरें तभी पता लगती हैं, जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा। ऐसे वर्तमान बुद्धिजीवियों का अवलोकन कर हम इतना शत्तिर्या कह सकते हैं कि कैक्टस की मुस्कान में तो सिर्फ कांटे हैं, बुद्धिजीवी की दुर्लभ मुस्कुराहट तो रहस्यमय है, उसमें कपट और कुटिलता का शानदार घोल है।

देखने में आया है कि ज्यादातर बुद्धि के संन्यासी संसार का भार ढोने की जन्मजात संडासी मुद्रा के शिकार हैं। कुछ दर्द उनके अपने हैं। बेहद निजी। मसलन इतने दिनों में बुद्धिचातुर्य के प्रदर्शन से पटाई लड़की को जैसे ही दूसरे ने कैश दर्शन दिए उसने पाला बदल लिया। ऐसे नितान्त निजी तो हैं ही, कुछ दर्द दुनिया के भी हैं। अपनी के अलावा, संसार की पीड़ा उन्हें इस कारण आक्रांत करती है कि उन्हें बुद्धिजीवी कहलाना है। सच्चई है, धन-लट्ट कन्या की चोट वह किससे बांटें? कन्या-विजय की बनाई छवि का अहम उनके आड़े आता है। इसीलिए अंतर में टिकी आंतरिक पीड़ा ज्यादा दुखदाई है। दुनिया के दर्द का क्या? इसका नगाड़ा तो वह मुफ्त की कॉफी के साथ हर बार बजाते ही रहते हैं।
 
अगर किसी शाम को दारू मिल जाए तो कहना ही क्या? उनकी मान्यता है। दारू दुश्मन है। घरेलू अमन-चैन के ऐसे दुश्मन का हनन करना ही करना। इस छोटे लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात वह बड़ी मंजिल की तलाश में जुटते हैं। इन हालात में अमेरिका को कोसना और चीन के गुण गाना उनका स्थाई भाव है। उनकी आवाज लड़खड़ाती, शब्द डगमगाते हैं पर दूसरी बोतल की उम्मीद में वह लगन से लगे रहते हैं।

कल्लू शहर के दार्शनिक पानवाले हैं। नगर की बाबू आबादी की उन्हें गहन जानकारी है। उनका कहना है कि दफ्तर के बाबू मक्खी मारने का वेतन पाते हैं, युनिवर्सिटी के सफेद-पोश बोलने का। यह दोनों कुछ तो कहते हें, तीसरे परजीवी किस्म के लोग हैं। इनका काम सिर्फ दूसरे के फटे में पांव डालना है। यह जन्मजात मुफ्तखोर हैं। मुफ्त का खिलाएं तो खा लें, पिलाएं तो पी लें। ऐसे खटमल बाबुओं को बुद्धिजीवी भी कहते हैं। कल्लू का संत्रस एक भोगा हुआ यथार्थ है। दो ‘खटमल-बाबू’ बिना उधार चुकाए तिड़ी हो लिए थे। लिहाजा यह सामान्यीकरण निजी पीड़ा का परिचायक है।

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